खोया-पाया
बड़े ही उमस भरे दिन थे. विद्यालयों में कक्षायें कम कर दी गई थीं. बच्चियां खेल कूद ज्यादा कर रहीं थीं. उस समय सरकारी स्कूलों में ड्रेस तो निर्धारित होते थे पर पांव के लिए कोई नियम निर्धारित नहीं था. मसलन -जूते, चप्पल किसी भी प्रकार के पहनने की स्वतंत्रता थी. कबड्डी का खेल चल रहा था. कुछ बच्चियां अपने चप्पल जूते उतारकर किनारे रख खेलने में व्यस्त थीं तो कुछ आम के पेड़ की छाया में बैठ खेल के मजे ले रही थी. खेल ख़त्म हुआ. छुट्टी की घंटी बज उठी. सब दौड़ते भागते अपनी कक्षा की तरफ जाने लगी. वह छोटी सी कुछ ज्यादा ही सीधी बच्ची अपनी चप्पल खोज रही थी लेकिन उसे वह नहीं मिली. उसकी दीदी जो उसी स्कूल की कक्षा पांच में पढ़ती थी उसे खोजते -खोजते वहां पहुंची और कारण जानना चाहा. जबाब में वह रो पड़ी और चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी. उसे तो बस इस बात की तकलीफ थी कि अब मेरी चप्पल कब ख़रीदी जायगी? हो भी क्यों न, अति साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में पिता की तनख्वाह मिलने में अगर देर हो जाती तो दुकान से उधार लेना होता या किसी से कर्ज लेकर घर खर्च चलता था. बार-बार पैर के नाख़ून से धरती को खुरचते हुए उसकी दीदी ने देखा तो माज़रा समझ में आ गया. उसने दुसरे दिन उसके (रूचि)के क्लास में जाकर सभी लड़कियों से पूछताछ की लेकिन किसी ने कुछ नहीं बताया. पता भी हो तो कैसे चप्पल तो खेल के मैदान से गायब हुआ था. ग्रीष्मावकाश की घोषणा हो गई. चप्पल खोने की बात आई-गई हो गई. अब तो उसे नंगे पैर चलने की आदत सी पड़ गई थी.
गर्मियों की छुट्टियाँ हों, बच्चे घर में, दोपहर तो किसी तरह कटता था. चार बजते-बजते सभी बच्चे घर से बाहर अपने हमउम्र के साथ अपने तरह के खेल-कूद में व्यस्त हो जाते थे. रूचि भी अपनी दीदी के साथ घर से बाहर निकलती और अपनी जमात में खेलने में व्यस्त हो जाती, उसकी दीदी बड़ी थी अतः बड़ों की जमात में रहती और जब शाम होने को आती तो दोनों एक साथ मिलती और घर की ओर भागती. अमूमन सभी बच्चियों की इसी तरह की दिनचर्या हुआ करती थी.
एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि, उनकी माँ को एक संदेशा भेजना था अपनी पुरानी पड़ोसन को जो अब दुसरे मोहल्ले में स्थानांतरित हो चुकी थी. ज्यादा दूर नहीं था बस यही कोई दो सड़क को पार करना होता था. माताजी के आदेश का पालन करना जरुरी था अतः दोनों बहने जल्दी-जल्दी उस पड़ोसन चाची के यहाँ पहुंची, माँ की थाती उन्हें सुपुर्द किया. चाची ने बड़े प्यार से बिठाया. माँ का कुशल-क्षेम पूछा और लस्सी पीने को दिया उन दोनों ने शीघ्र ही लस्सी गटक लिया और चलती बनी मानो जैसे ट्रेन छूट रही हो. मन में एक मलाल था कि आज का खेल छुटा. दो चार कदम बढ़ी ही थी कि सामने छोटे से खाली जगह में कुछ लड़कियां कबड्डी खेल रही थी. दोनों वहां रूककर खेल में दिलचस्पी लेने लगीं. बड़ी बहन वहीँ घास पर बैठ गई. छोटी रूचि इधर-उधर हो रही थी. पता नहीं क्यों वह स्थिर नहीं हो पा रही थी. थोड़ी देर बाद दौड़ती हुई आई और कहा---"दीदी-दीदी, देखो मेरी चप्पल मिल गयी-मिल गयी...! सचमुच वही चप्पल थी, वही खोई हुई चप्पल! वह डर भी रही रही थी कि इसकी जो नई मालकिन होगी वह पीछे न पड़ जाये. और हुआ भी वही जिसका डर था.
एक लड़की जो रूचि की उम्र से थोड़ी बड़ी होगी, तेज क़दमों से इधर आ रही थी और उसके पीछे दो-तीन लडकियां भी थी. आते ही उसने सवाल दागा- 'तुम मेरी चप्पल पहन कर कहाँ भागी जा रही हो?'
रूचि ने पूरी हिम्मत जुटा कर कहा, 'यह मेरी चप्पल है. वहां घास पर पड़ी थी, मैंने पहन ली. यह स्कूल से चोरी हो गयी थी.'
लड़की का जवाब था, 'यह मेरी चप्पल है. हमलोग चोर लग रहे हैं?' एक साथ तीन लड़कियों की आवाज़ थी. रूचि की दीदी चुपचाप यह सब देख रही थी. वह उठ खड़ी हुई और पूरे आत्मविश्वास के साथ बोली-'मैं जानती हूँ, ये रूचि की ही चप्पल है. वह काफी दिनों से इसे पहन रही थी. अगर तेरी खरीदी हुई है तो तेरे घर के बड़ों को तो पता ही होगा? चलो तेरे घर चलते हैं, अभी फैसला हो जाएगा.'
थोड़ी देर के लिए चुप्पी छा गयी. सभी लडकियां तेजी से घर की ओर चल पड़ीं और पूरी ताकत लगाकर बांस का फाटक खोला. फाटक खुलने की आवाज़ सुनकर घर से एक अच्छे डील-डौल वाली महिला निकली, 'क्या बात है? तुम लोग इस तरह धम-धम क्यों कर रही हो?'
रूचि की दीदी ने बड़े ही आत्मविश्वास से कहा-'चाची जी, चप्पल का झगडा है. ये चप्पल मेरी बहन की है जो स्कूल में खो गयी थी. आज मैदान में दिख गयी तो इसने पहन ली. आपसे यही पूछना है कि क्या रूपम को यह चप्पल आपने खरीद कर दी थी? यदि हाँ, तो हमलोग इस चप्पल को छोड़ देंगे.'
बिना विलम्ब किये उस महिला का जवाब था---'रूपम यह चप्पल स्कूल से ही उठा कर लायी थी. यह मुझे अच्छी तरह मालूम है. मैंने इसे खरीद कर नहीं दी है.'
बस क्या था- चप्पल की नयी मालकिन का सिर निचे झुक गया, उस महिला के सामने कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी उसकी. इस तरह खोया-पाया का पटाक्षेप हो गया.
अलबत्ता ये विचित्र ही संयोग कहा जाएगा कि उस पादुका की चोरी खेल के मैदान में हुई थी और पुनः खेल के मैदान में ही वह अपने असली मालिक के पास पहुँच गयी. यह खोया-पाया वाली घटना कुछ दिन चर्चा का विषय रही. मेरा खोजी स्वभाव उस महिला के बारे में कुछ और जानने को उत्सुक हो उठा. मैं जानकारी इकट्ठी करने चली तो हैरत में पड़ गयी------
वह महिला उस लड़की की सौतेली माँ हुआ करती थी. अगल-बगल के लोगों का उनके बारे में अलग-अलग भ्रांतियां थीं. कुछ अजीब विशेषणों से उन्हें विभूषित किया करते थे, मसलन- निर्दयी, स्वार्थी इत्यादि. लेकिन मेरी नज़र में वह सत्य का साथ देने वाली, बच्चों के गलत-सही व्यवहार पर नज़र रखने वाली, जिम्मेदारी से भरपूर महिला लगी. क्षण भर में ही उनपर लगे सारे विशेषणों के परखच्चे उड़ चुके थे. वह एक 'माँ' थी और सिर्फ माँ. मैंने मन ही मन उन्हें नमन किया और वापस चल पड़ी.

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