यादों के फूल
कॉलेज का पहला दिन, रंग बिरंगे परिधानों में लड़कियां. कला और विज्ञान दोनों संकाय की पढाई एक ही कैम्पस में होने के कारण गहमा-गहमी कुछ ज्यादा ही थी. वह (रौशनी) बहुत खुश थी- एक तो स्कूल की एकरसता के माहौल से छुट्कारा और दुसरे इतने बड़े कॉलेज में नामांकन हो जाना वह भी विज्ञान संकाय में. उस समय में एक साधारण परिवार की लड़की के लिए यह बहुत बड़ी बात समझी जाती थी. परिवार का रूतबा समाज में भी बढ़ जाया करता था. उसके सपनो को तो मानो पर लग गए थे. कुछ दिनों तक तो काफी धम-धूम होता रहा जैसा की प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों के साथ होता है, एक अलग माहौल में तारतम्य बिठाने में लग ही जाता है. दुसरे महीने आते-आते सारी कक्षाएं नियमित हो गई. प्रायोगिक कक्षाएं भी सुचारू रूप से चलने लगीं रसायन विभाग में कमरा कुछ छोटा होने की वजह से प्रयोगशाला दो भागों में विभाजित थी. एक जो टीचर्स केबिन से संगलग्न था जैसा स्वाभाविकतया रहा करता है. दूसरा भाग एकदम अलग था. उसमें लड़कियों को हंसने-बोलने की अतिरिक्त स्वतंत्रता मिल जाती थी. कुछ शरारती लड़कियां जिनका ध्यान पढाई की तरफ कम रहता था अपने मन के हिसाब से समय बिताती और दो चार लड़कियों की कापियां (जो उनकी नजदीकी होतीं) ले कर कुछ मिलता-जुलता खाका बनाकर प्रयोग की खानापूर्ति कर लिया करतीं. वह क्लास उन जैसों के लिए बड़ा ही आनंददायक क्षण हुआ करता.
प्रथम वर्ष की वार्षिक परीक्षा हुई बहुत सी लड़कियों के अंक कम आये. उन्हें सावधान किया गया यदि वे ध्यान से पढना नहीं चाहती तो कृपया विज्ञान छोड़कर कला संकाय में चलीं जाएँ, अभी समय है अन्यथा आगे रोक दिया जाएगा. कुछ लड़कियों ने तो बाकायदा कला संकाय के लिए अपने आवेदन भी जमा कर दिये. बाकि सब अपनी पढाई के प्रति सजग और सावधान हो गई. गिनी -चुनी लड़कियां ही ऐसी रह गई थी जिनका मन पढाई से इतर कुछ करने को जी मचलता रहता. रूपा इन्ही में से एक थी. जब तब मन शरारत करने को मचल उठता लेकिन किसी का साथ न मिलने के कारण मन मसोस कर रह जाती. एक वाकया ऐसा हुआ-- रसायन विभाग की दो टीचर्स एक साथ छुट्टी पर चली गई प्रायोगिक कक्षा में एक जूनियर टीचर आई और कुछ -कुछ समझा कर एक चेतावनी के साथ- मेरे ऊपर ज्यादा जिम्मेदारी आ गई है इस वजह से मैं दुबारा क्लास में नहीं आ पाऊँगी एक लड़की आ कर सारी कापियां जमा कर जाना. यह सुनते ही रूपा की तो मानो चाँदी हो गई इतने दिनों बाद इतनी स्वतंत्रता टीचर के आने का डर ख़त्म. भला इस मौके को वह हाथ से कैसे जाने देती. प्रैक्टिकल की ऐसी की तेसी सभी लड़कियां अपने-अपने प्रयोग में तल्लीन हो गई. रूपा ने भी किसी तरह अपना इंस्ट्रूमेंट सेट कर लिया और इधर -उधर घुमने लगी. कभी किसी को कुछ कह देती-छेडती. हद तो तब हो गई जब उसने पानी लेकर प्रयोग करती हुई लड़कियों पर छिड़कना शुरू किया ज्यादातर लड़कियां उसी के ग्रुप की थी, कुछ दब्बू स्वाभाव की थी. दो -तीन मिनट तक यह क्रम चलता रहा. रोशनी से नहीं रहा गया. उसने रूपा से कहा--तुम्हे कुछ करने का मन नहीं है तो न सही, लेकिन दुसरे को डिस्टर्ब मत किया करो. पर उसने अपना कार्य जरी रखा मनो कोई असर ही न पड़ा हो. रोशनी ने फिर सावधान किया "अगर तुम अपनी चुहलबाजी बंद नहीं करोगी तो फिर भुगतने के लिए तैयार रहो. उसने फिर हंस दिया "क्या कर लोगी?" रौशनी ने पास पड़े बीकर में रखे पानी को रूपा के पीठ पर दे मारा. वह आग बबूला हो उठी और अपने ग्रुप की लड़कियों की ओर देखते हुए कहा -"यह क्या बदतमीजी है ". रौशनी का आत्मविश्वास भरा जवाब था --"अगर किसी को तंग करके आनंदित होती हो तो तंग होने में भी आनंदित रहो. क्रोधित होने का अधिकार सिर्फ तुम्हे ही मिला है क्या?" सभी लड्कियां चुप थीं. किसी से कुछ कहते नहीं बना.
वह अपना सा मुंह लेकर अपने सीट पर जाकर बैठ गई. कक्षा ख़त्म हुई. सभी अपने -अपने घर को चलीं. लेकिन इस घटना के जब भी उन दोनों का सामना होता तो वे एक दुसरे को देख कर मुहं फेर लेतीं. यदि गलती से अगल-बगल बैठना पड़ा तो मुहं एकदम बंद. समय अपनी गति से चल रहा था. कॉलेज का वार्षिकोत्सव हुआ. सभी लड़कियां उन्मुक्त होकर जहाँ-तहां बैठ जा रहीं थी. लेकिन वे दोनों अपने-अपने सीट के प्रति कुछ ज्यादा ही सावधान रहतीं. देखते ही देखते फाइनल एग्जाम आ गया. थ्योरी की परीक्षाएं सम्पन्न हो चुकी थी. अब प्रायोगिक परीक्षा की बारी थी. सभी परीक्षार्थी अपने अपने विषयों के प्रति काफी गंभीर थीं.
बारह तारीख आ गयी. भौतिक विज्ञान की प्रायोगिक परीक्षा थी. जीव विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए यह थोडा गंभीर विषय माना जाता है. लड़कियां थोड़ी चिंतित भी लग रही थी. बाहरी टीचर्स की मौजूदगी में प्रयोग करना पड़ता था.
एक तरह से कौन कितने पानी में है इसकी जांच कर ली जाती है. रौशनी को कोई ख़ास चिंता नहीं थी क्योंकि वो कभी भी भौतिक विज्ञान की प्रायोगिक कक्षा में अनुपस्थित नहीं रही थी. यहाँ ये बता देना लाजिमी होगा कि इस परीक्षा में एक चीज़ बड़ी मजेदार होती थी-- थोड़ी किस्मत भी साथ देती है, आपकी पुस्तिका में जो प्रश्न हैं आपको उन्ही पर प्रयोग करने होते हैं, सबके प्रश्न भिन्न-भिन्न होते हैं, अगर किसी कक्षा में अनुपस्थित थीं और उसी कक्षा से आपके प्रश्न आ गए तो आपकी परेशानी निश्चित रूप से बढ़ जाती है.
नाम ही तो है प्रयोग, यदि किया है तो फिर कोई डर नहीं, ठीक उसी तरह उसका उल्टा भी होगा.
सबों को प्रश्न आबंटित किये जा चुके थे. सारी लडकियां अपने-अपने इंस्ट्रूमेंट लेकर सेट कर रही थीं. अचानक कुछ अजीब हुआ, रूपा, रौशनी की मेज के पास आकर खड़ी हो गयी. रौशनी अपने काम में मगन थी. अचानक उसे एहसास हुआ जैसे कोई उसके बगल में हो, सिर उठाया तो उसे विश्वास नहीं हुआ. वह चुप रही. रूपा ने मौन तोडा- "प्लीज रौशनी मेरी थोड़ी मदद कर दो, मेरा जो प्रयोग है उसे मैंने कभी किया ही नहीं था. थ्योरी के आधार पर थोडा तो समझ में आता है पर बिना बताये मैं नहीं कर पाउंगी.जब मैंने टीचर जी से पुचा तो उन्होंने कहा- "अभी मैं तुम लोगों से बात नहीं कर सकती. देख रही हो न, एक्सटर्नल एग्जामिनर यहीं पास ही है. अभी मौका है, तुम रौशनी से क्यों नहीं पूछ लेती, उसने तो रेगुलर क्लास की है."
रौशनी सब सुन रही थी लेकिन उसका मन कहीं दूर पीछे चल रहा था बीते हुए दिन वह क्रूरता, अपमान आदि आदि. यह चुप्पी टूटी-" प्लीज रौशनी, मैं अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगती हूँ."
ऐसा लगा मानो बादलों से आच्छादित आकाश अचानक से एकदम स्वच्छ हो गया.मन की कलुषता ख़त्म हो गयी, और वो निर्मल हो उठा. "चलो", धीरे से आवाज़ हुई. और उसने जाकर रूपा को पूरा प्रयोग अच्छी तरह समझा दिया, साथ ही यह भी कहा,"कोई दिक्कत हुई तो मौका देखकर पूछ लेना." परीक्षा का समय समाप्त हुआ. सारी लडकियां अपना-अपना प्रयोग ख़त्म कर सारी औपचारिकताएं पूरी कर अपने घर को हो लीं.
देखते-देखते परिणाम का दिन भी आ गया, पहले घर बैठे परिणाम पता नहीं चलता था, इसलिए सभी लडकियां अपने कॉलेज की तरफ चल पड़ीं. उत्सुकता यह थी की अंक कितने आये हैं, परसेंटेज कितना है. बड़ा ही अनोखा दृश्य सभी लडकियां एक दुसरे से मिल रही थी बधाईयाँ दे रही थी. कुछ उदास सी थी, एक लड़की भीड़ को चीरती हुई इस ओर आ रही थी. उसकी नज़रें बेसब्री से किसी को ढूंढ रही थीं. और उसने हाथ बढ़ाया रौशनी की तरफ, वह रूपा थी. दोनों बड़ी ही गर्मजोशी से मिली रूपा ने कहा-"मैं पास हो गयी, वक्त पे तुमने मेरा साथ दिया, मैं याद रखूंगी. चलती हूँ."
रौशनी कुछ बोल नहीं पा रही थी, आँखों में ख़ुशी के आंसू थे. इस विद्या के मंदिर में सभी तो एक ही उद्देश्य से आते हैं, अच्छी शिक्षा ग्रहण करनी है और एक नेक इंसान बनना है. कैसा द्वेष और कैसी कलुषता? ये सब घटनाएं तो यादों के फूल हैं- उसने संभाल कर रख लिया, ज़िन्दगी की माला जो पिरोनी है.

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