कलफ़ वाली साड़ी
जब आप दूसरों के काम आते हैं तो हर कोई आपको हाथों हाथ लेता है. यही कारण था कि उस नन्हीं बच्ची को सब पूछते वरना वह किस काम की. अपने माँ-पिताजी के बारे में कुछ भी अपमानजनक बातें उसको बर्दाश्त नहीं होती थी इसलिए भी उसने अपने को उपयोगी बनाना सीख लिया था. कभी किसी का सवाल हल नहीं होता- किसी को अपनी पुस्तक में कवर लगवाना हो तो, किसी के बस्ते को मरम्मत की ज़रूरत हो तो, और न जाने क्या-क्या इन सभी कार्यों के लिए उसकी पूछ होती, उसकी खोज होती स्कूल में शिक्षक हमेशा उसकी प्रशंसा करते, शाबाशी देते. पर उसे इन सबका तनिक भी गुमान नहीं था. उसे तो आगे बढ़ते जाना था ताकि वह सामाजिक दंश से अपने और अपने छोटे से परिवार को बचाने की शक्ति हासिल कर पाए. परीक्षाफल का दिन आता तो माँ बहुत प्रशन्न होती "मेरी बेटी प्रथम आई है" बड़े गर्व से कहती लेकिन लोगों की पेशानी पर बल पड़ जाते. यह देख उस बच्ची की परेशानी बढ़ जाती इससे भी कुछ बड़ा करके दिखाना है ताकि मेरी माँ और खुश हो--- लोग जलें तो जलें. उसे याद है अच्छी तरह, वो दिन जब वह मेले में गई थी. जितने पैसे उसके पास थे कितने जोड़-तोड़ कर, हिसाब लगाकर अपने छोटे भाई-बहनों के लिए एक-एक चीज खरीद ली थी. ऐसा लगा था मनो जंग जीत लिया हो. मेले से वापस घर आई तो माँ ने देखा-सभी बच्चों के लिए सौगात है. कितनी खुश हुईं थी--मेरी बेटी सब के लिए सोचती है साथ ही थोड़ी उदास भी. अपने लिए कुछ बढ़िया सा नहीं खरीदी फिर बुदबुदाई-मैंने पैसे ही कितने दिये थे? बेटी ने मुहं पर हाथ रख दिया-माँ वे दिन भी आयेंगे, जरुर आयेंगे. तुम उदास न हो. इस तरह यह छोटा सा परिवार सब के बीच रहकर भी अलग सा था. समय अपनी रफ़्तार से चल रहा था. बड़े ही उतर -चढ़ाव के साथ पढाई भी अपने आखिरी पड़ाव की ओर अग्रसर थी.अचानक से सब कुछ बिखर गया. लगा जैसे एक आंधी आई और सब कुछ तहस-नहस हो गया सपने जो पर लगाकर उड़ने की तयारी कर रहे थे, किसी ने पर ही क़तर दियें हों.
समय परिवर्तनशील है यह अपने-आप में अकाट्य सत्य है धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होता गया सारी कड़ियों को जोड़ने की कोशिश हुई. पढाई की अंतिम कड़ी जोड़ने की कवायद शुरू हुई. किसी तरह शहर में रहने का आश्रय मिला, थोड़े दिनों की ही बात थी उसके बाद गाँव में रह कर परीक्षा का इंतजार करने लगी. बीच में मन उबता तो कभी शहर हो आया करती. वहां सभी परिचितों के यहाँ जाकर खानापूर्ति करना होता. एक बात बड़े ही गौर करने लायक होती--वहां हर जगह उसकी पूछ होती कारण-जगह के हिसाब से वह उनलोगों के रोजमर्रा के कार्यों में अपना योगदान देती. कहीं उसके लिए कपडे (सिलाई के लिए) इंतजार करते, कहीं बच्चे कहानियां सुनने के लिए कहीं बड़े अपने समस्याओं के समाधान के लिए, किसी भाभी को खाना बनाने में मदद और मन लगाने के लिए. मेहमान की तरह एक जगह सिमट कर बैठना उसकी फितरत नें नहीं था. जाते समय--फिर कब आएँगी, दीदी जल्दी आना, बुआ फिर आना नई-नई कहानियां सुनाना. उसे बड़ा ही अच्छा लगता अपने महत्व को देखकर. देखते ही देखते कब पढाई खत्म हुई और जॉब भी मिल गया पता ही नहीं चला. व्यस्त रहना बड़ा ही अच्छा होता है .
उसने नई नौकरी ज्वाईन की. लेकिन अब नई मुश्किले भी आने लगी थीं उसे लगा ऑफिस के लिए परिधान पर्याप्त नहीं हैं. उस समय साड़ी ही उपयुक्त परिधान माना जाता था. उसके पास तो साड़ी थी ही नहीं यूँ ही शौकिया पहना करती थी. बस एक या दो होंगे वे भी उतने ठीक नहीं. माँ के पास तो बाहर जाने वाली साड़ी थी ही नहीं सारे पैसे तो नौकरी के मद में आने जाने इधर-उधर के खर्चे में ही ख़त्म हो चुके थे. अचानक एक ख्याल आया--क्यों न उना से दो साड़ियाँ मांग लूँ, फिर अगले महीने वापस कर दूंगी. वह तो बहन से ज्यादा सहेली जैसी है उसे कहने में ज्यादा संकोच नहीं होगा.अंतरात्मा से आवाज़ आई मांगना उचित नहीं होगा. मन और आत्मा के बीच कश्मकश चलता रहा आखिर में मन जीत गया. और वह वहां पहुँच गई. बड़ी हिम्मत कर उसने कहा--"उना मुझे दो साड़ियाँ दोगी कुछ दिनों के लिए, मुझे ऑफिस में ठीक नहीं लगता. तुम्हारी मदद से थोड़ी सहूलियत हो जायगी". यह सुनकर उना जडवत हो गई. सामने आई चाची--'अरे कैसी बात करती हो ये कहाँ से साड़ियाँ देगी. इसकी साड़ियाँ तो ससुराल जानी है. भला उसमें से कैसे देगी. उसने कहा-"मैं नई साड़ियाँ नहीं मांग रही बस काम चल जाने जैसी चाहिए." फिर भी कोई उत्तर न मिला. रोजी को तो जैसे काठ मार गया--यही वह जगह है जहाँ कपड़ों के ढेर लगे रहते थे. वह मशीन चला रही होती और एक -एक कर सारे कपडे सील कर फेकती जाती और यही वे दोनों हैं कितनी हंसमुख बनी रहती. वह मशीन की ओर देखे जा रही थी. शायद वह सजीव होता तो कुछ जबाब दे पा ता और कहता--जिस बच्ची ने तेरे लिए इतनी मेहनत की, तेरे लिए पसीने बहाए क्या तुम उसकी थोड़ी सी मदद नहीं कर सकती? लेकिन हाय रे बद्किश्मती, उन्हें न करना था न किया. अंतरात्मा ने मन को कोसा-नहीं मानी न मेरी बात अब समझ? रोजी को लग रहा था यहाँ से अगर कोई पतली गली निकलती तो वह उससे निकल भागती पर व्यावहारिकता तो निभानी थी. उसने ही वातावरण का मौन तोडा. खैर कोई बात नहीं. जाने दो. उसने कुल पंद्रह मिनट वहां कैसे बिताये बताना मुश्किल है.जब वहां से निकली तो ऐसा महसूस कर रही थी जैसे जेल से छुट कर कैदी भागा हो.
इस संसार में ज्यादातर लोगों का मतलब लेना और देना से है उन्हें मदद और सहायता जैसे शब्दों से नफरत होती है लेकिन दुनियां तो ऐसी नहीं है उपरवाला हर क्षण हर जगह हमें देखता है. हम जैसा करते हैं वैसा ही वह हमें लौटाता है. गर्मियों के दिन थे वह ऑफिस में अपने कार्यों में व्यस्त थी तभी छोटा भाई आकर एक संदेशा दे गया-"उना दीदी आई है चाची के साथ. काफी परेशान है तुम्हें पूछ रही है इसलिए मैं तुम्हें कहने आ गया. रोजी ने क्षण भर को सोचा और उठी. उसने अपने वरिष्ठ अधिकारी से थोड़ी देर की छुट्टी ली और घर को चल पड़ी. घर जाकर देखा-वे लोग परेशान थी कहीं से लौट रही थी. बस में सीट नहीं मिली थी. उन्हें याद आया, रोजी तो यहीं है इसलिए थोडा रुक कर आराम कर शाम की गाड़ी से घर वापस जाया जाय. बातों ही बातों में जाना की उन्होंने कुछ खाया नहीं है. उसने तुरत खाना चूल्हे पर चढ़ा दिया. कुकर की मदद से तुरत ही खाना तैयार हो गया. फिर उसने दोनों की ओर मुखातिब हो कहा-मैं रुक नहीं पाऊँगी. तुमलोग अच्छे से खा लेना और आराम करना. मैं शाम को आउंगी, हर हाल में तुमलोगों के जाने से पहले लौटूंगी. फिर बातचीत होगी कहते-कहते उसने हाथ पोछने के लिए तौलिया खिंचा. खींचने के क्रम में वहां करीने से रखी साड़ियाँ दिखने लगीं. वह निकलने को थी अनायास कुछ धीमी आवाज़ कानों में पड़ी-साड़ियाँ है तो सस्ती ही पर यह रखती है ढंग से इसलिए अच्छी लग रही है. उसने इन बातों को तवज्जो न देते हुए उलट कर देखना उचित न समझा और ऑफिस के लिए चलती बनी. समय की पाबन्दी जो थी. ऑफिस पहुँच कर अपने कार्य में तल्लीन हो गई. सारे कार्य निपटा लेने के बाद वह निश्चिंत हुई तो ख्याल आया अरे,आज तो घर समय से पहुंचना है, इधर -उधर की कोई खरीदारी नहीं करनी है. इतने दिनों बाद जी भरकर बातें करुँगी वह बहुत ही उत्साहित थी. दराज बंद किया, बैग कंधे पर लटकाया और जल्दी-जल्दी चल पड़ी घर की ओर. कितनी खट्टी-मीठी यादें मन में घुमड़ने लगी थी. रोज -रोज की ऑफिस के उबाऊपन से थोड़ी देर राहत के बीतेंगे. लम्बे -लम्बे डगभरते हुए उत्साह से लबरेज वह घर पहुंची.
कमरे के अन्दर जाते ही सारा उत्साह ठंढा पड गया . उना और चाची कुछ गंभीर बातचीत कर रही थी .रोजी ने उना की ओर देखा--बिलकुल ठंढी और बेजान दृष्टि से उना ने देखा और कहा--'हमलोगों ने खाना खा लिया है. तुम्हारे लिए कुछ बचा कर रख दिया है देखो वहां ढंका हुआ है". उठना भी मुनासिब नहीं समझा. रोजी को तो एक क्षण के लिए लगा जैसे वह अपने घर में नहीं है. उनके घर पे ही है और वे लोग उसपर एहसान कर रहे हैं दूरदर्शन के धारावाहिक की तरह जिंदगी की सारी घटनाएँ एक-एक कर घुमती गई और साड़ी पर आकर अटक गई. वह देख रही थी उना की नजरें उसकी रखी साड़ियों की ओर ही थी. फिर उसने कोई बातचीत नहीं की. रोजी ने ही चुप्पी तोड़ी मैंने अपने स्टाफ को कह दिया है सात बजे वाली गाड़ी की टिकट कटाकर रखेगा. तुम लोगों को छः पैंतालिस तक स्टेशन पहुँच जाना चाहिए, रिक्शावाले को कह दिया है वह पहुँचता ही होगा. उसी क्षण रिक्शावाले ने घंटी ट्रिन-ट्रिन की. अब जाने की बारी थी. चाची पहले निकली फिर उना निकलने को थी. रोजी को लग रहा था अभी भी कसर पूरी हो सकती है. लेकिन नहीं, उना ने कहा, "हर महीने साड़ी खरीदती हो, ढेर सारी साड़ियाँ दिखी हैं?" उसने जवाब दिया,"ऐसा तो नहीं है, ज़रूरत के हिसाब से खरीद लेती हूँ. बहुत ज्यादा भी तो नहीं है." उत्तर मिला-"हाँ, हाँ, मैंने छु कर देखी है ज्यादा कीमत वाली तो एक भी नहीं है. कलफ़ लगी हुई साड़ी है इसीलिए अच्छी दिखती है."
जवाब सुनकर रोजी स्तब्ध रह गयी और मन अट्टहास कर रहा था, कलफ़ वाली साड़ी, कलफ़...

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