उस पार की दुनिया


सूर्योदय होने को था, शीतल हवा मद्धिम-मद्धिम चल रही थी. एक परिवार अपने गंतव्य की ओर जाने की तैयारी कर रहा था. सामान बांधे जा चुके थे. दूसरी ओर संयुक्त परिवार की सुविधा संपन्न उम्रदराज औरतें 'बड़ी' (उरद की दाल को पीसकर तथा उसके छोटे-छोटे गोले बनाकर सुखाना) बनाने में व्यस्त थीं. कुछ लोग सुबह की सुकून भरी निंद्रा में लीन थे. केले के पत्ते काटकर बड़े ही सलीके से आँगन के किनारे रखे हुए थे. बड़े-बड़े बर्तनों में सामग्रियां थीं, केले के पत्ते पर ही बड़ियाँ बनायी जाती हैं. दोनों ही धुप में अपने-अपने तरीके से सूखते हैं. एक को संभालकर खुरच कर रख लिया जाता है, और दुसरे- पत्ते का जो हस्र होना है वो होता है.
भुवन भास्कर पुरे ओज के साथ प्रकट हो गए. चारों ओर प्रकाश फ़ैल गया, मानो कोई सन्देश दे रहा हो, पर यह सन्देश विरले ही पढ़ पाते हैं. एक बेटी अपने मायके से विदा हो रही थी. अपने छोटे-छोटे बच्चों और शौहर के साथ. पांच-छः महीनों बाद उसके पति उसे लेने आये थे. बेटी ने आँगन में उतरकर अपने सभी- बड़ी अम्मा, छोटी अम्मा, चाची...सबों के पैर छुए. सबने मुंह से आशीष दिया, जियो, फूलो-फलो, साथ ही एक खुसर-फुसर भी हो रही थी, अच्छा हुआ जो जा रही है. नहीं तो पता नहीं और कितने दिन यहाँ रोटियाँ तोडती अपने बच्चों के साथ. बिना बुलाये जब-तब पहुँच जाती है. माहौल ज़रा भी ग़मगीन नहीं था. किसी ने उठने की जहमत मोल लेना उचित नहीं समझा. बस अपनी माँ उठी और बाहर तक आई. थोड़ी दुखी तो थी, माँ जो थी लेकिन उनके चेहरे पर भी एक सुकून सा था कि अब उनकी बेटी को इधर-उधर की बातें नहीं सुननी पड़ेगी. मसलन- "यहाँ आ गयी है, ना कोई पर्व न त्यौहार, बस दिन काटने के लिए." इस तरह विदाई की रस्म पूरी हो गयी. वे सब समय पर स्टेशन पहुँच गए. ट्रेन चल पड़ी, और यात्रा शुरू हो गयी. काफी दुरी (लगभग 700 किलोमीटर) की दुरी तय कर छोटा नागपुर की पहाड़ियों के बीच बसे एक गाँव में पहुँच कर उनकी यात्रा पूरी हुई. एकदम नया माहौल, नए लोग वहां एक-एक चीज़ जोड़कर गृहस्ती चल पड़ी. पिताजी अपनी ड्यूटी पर शहर चले जाते. बच्चे माँ के साथ वहीँ घर पर रहते. पढाई-लिखाई का तत्काल कोई इंतज़ाम नहीं हो पाया था. यहाँ ये बता देना लाजिमी होगा कि साल भर पहले बच्चों की पढाई-लिखाई ठीक-ठाक चल रही थी. पिता का तबादला सुदूर प्रदेश में होने की वजह से सबकुछ बिखर सा गया था. बच्चे तो अपनी दुनिया में मस्त होते मगर माँ अपना दैनिक कार्य ख़त्म कर उदासी की दुनिया में चली जाती. किसी अपने की खबर मिले, चिट्ठी लिखूं, लेकिन उनके पति को यह पसंद नहीं था. शायद उन्होंने भी कुछ खुसर-फुसर सुन ली थी या वहां उनके सम्मान को ठेस पहुंची थी. बच्चों को इस बात से क्या लेना देना. पर वे माँ को खुश रखने की कोशिश करते, माँ भी उनके साथ हंस बोल कर सब कुछ भूल जाती.चार बच्चों और माँ की ये अलग दुनिया थी. कुछ किस्से कहानिया होती कभी कुछ किताबें पढ़ी जाती. धीरे -धीरे अगल-बगल के लोगों से मेल-मिलाप बढ़ रहा था. समय अच्छे से बीत रहा था. एक दिन इस शांत दुनिया में हलचल हो उठी. एक आदमी आया जो शायद बच्चों की माँ का दूर का रिश्तेदार हुआ करता था . उसने बताया -जब से आपलोग वहां (मायके) से आये हैं कोई हाल -चाल नहीं मालूम होने की वजह से आपकी माँ बहुत ही चिंतित है. आपकी बहन ने हमें भेजा है वह भी मिलने के लिए आएगी. बच्चों से बिना कोई संवाद के वो चले गए. माँ ने बच्चों को बताया की तेरी मौसी आने वाली है. बच्चे बड़ी उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे. दो चार दिन बाद मौसीजी आयीं सपरिवार साथ में अपने एक मेहमान को भी ले आई बड़े ही मेहनत से खाना बनाया गया इतने दिनों बाद मेहमानों का आना हुआ था. बच्चे भी दौड़ -दौड़ कर हाथ बटा रहे थे. खाते-पीते बातचीत करते दिन बीत गया. वे बड़े गर्व से अपने सुविधा संपन्न जिंदगी के बारे में बता रहे थे --मेरा घर बीच शहर में है. बच्चे बड़े स्कूल में पढ़ रहें हैं आदि आदि ----. पूछने के लिए बस इतना ही-ऐसे घर में, ऐसी जगह में क्यों रह रहें हैं. बच्चों का भविष्य क्यों ख़राब कर रहें हैं. जितनी भी नकारात्मक बातें हो सकती हैं उन्होंने की. बच्चे जो थोडा बहुत समझ पा रहे थे उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था. वे लोग चले गए और जाते -जाते इस दुनियां में हलचल मचा गए.
दुसरे दिन पिताजी अपनी ड्यूटी पर चले गए. माँ और बच्चों की दुनिया में एक अजीब उदासी छा गयी थी. बाहरी लोगों के आने से उम्मीद की किरण धूमिल सी हो गयी थी. धीरे-धीरे माँ के समझाने और कहानियां सुनाने के बाद रबिन्द्रनाथ टैगोर की कहानी जिसमे उन्हें एक घेरे के अन्दर रहने को कहा जाता है ने काफी प्रभावित किया. फिर धीरे-धीरे उनका जीवन सामान्य हो गया और समय सकारात्मक कार्यों में में बीतने लगा. बाद में एक चिट्ठी बड़े ही शिकायत भरे लहजे में, बच्चों की नानी के द्वारा भेजी गयी थी, जो शायद उन्होंने किसी से लिखवाई होगी. उसमे ज़िक्र था- तुम्हारी बड़ी फ़िक्र लगी थी. इसीलिए कितनी ही मिन्नत करके मैंने छोटी को तुमसे मिलने भेजा था.जो इस बात का सूचक था कि बहन का यहाँ मिलने आना स्वतः नही था. कभी किसी की शादी होती और भी कोई आयोजन होते तो किसी तरह एक चिट्ठी के माध्यम से सुचना दे दी जाती. ना कोई आमंत्रण ना आग्रह. कभी सालभर में माताजी के द्वारा लिखवाई चिट्ठी आती, तो उसका मजमून होता- एक बार मुझसे मिल लो, पता नहीं बिना देखे चली जाउंगी, किसी से कहती हूँ मुझे अपनी बेटी से भेंट करवा दे, लेकिन कोई नहीं सुनता. तुझे देखने को जी तरस गए.बेटी को जब चिट्ठी मिलती वह पढ़ती और सोचती एक माँ ही तो है जिससे उसने प्यार पाया है. पिता ने तो कभी ठीक से बात तक नहीं की. नहीं तो क्या मजाल कोई इस तरह हमें दुत्कारता. जार-बेजार रो लेती और फिर स्थिति सामान्य हो जाती. एक तो पति की बेरुखी और दुसरे अर्थाभाव कहें तो किस मुंह से चुप लगा जाती.
उस पार की दुनिया में किसी को कहाँ फ़िक्र थी कि इन माँ-बेटी का मेल हो. यदा-कदा कभी कोई आता और सुना जाता, “तेरी माँ बहुत बेचैन हो रही है कभी जाकर क्यों नहीं मिल लेती?” समय बदलता ही रहता है. बच्चे थोड़े बड़े हो गए. गाँव को छोड़कर उस परिवार ने शहर का रुख कर लिया. बड़े बच्चे का दाखिला स्कूल में करा दिया. सबों के नहीं होने का कारण पैसे की तंगी ही रही. वह परिवार अपनी दुनिया में अभाव में भी अपने हिसाब से मस्त था. अपनी मेहनत पर भरोसा करने वाले को रास्ता मिल ही जाता है.
वह दिन, ओह! उसने खाना भी नहीं खाया था. दोपहर हो चुकी थी. वही व्यक्ति जो छोटी बहन का रिश्तेदार था, एक पोस्टकार्ड पकड़ा कर चलता बना. वह पोस्टकार्ड क्या था- पढ़ते ही दुखों का पहाड़ टूटकर गिर पड़ा. अबतक जो आंसू थामे हुए थे वो निर्बाध बह निकले. बच्चों ने घबराकर माँ को चारों ओर से घेर लिया और पूछा, वह कुछ नहीं बोल पायी बस रोती रही. सामने जमीन पर पोस्टकार्ड गिरा पड़ा था. उसपर लिखा था, “तुम्हारी माँ चल बसी, तुम्हे बहुत याद कर रही थी.मृत्यु की तारीख के अलावा और कोई ख़ास बात नहीं थी. बच्चे ने पूछा, “यह पोस्टकार्ड किसने दिया? क्या उस पार की दुनिया का आदमी था?” माँ ने सहमति में सर हिला दिया. बच्चे को तसल्ली हुई. वह पहले भी बड़े ही गौर से आसमान की ओर देखा करता और सोचता, एक दुनिया उस पार भी है. वह दुनिया हमारी दुनिया से अलग है. पता नहीं कैसी होगी वह दुनिया? आज उसे लग रहा था, वह दुनिया ठीक नहीं है. वे लोग मेरी माँ दुखी और उदास करके चले जाते हैं. माँ ग़म में डूबी हुई थी बच्चे सहमे-सहमे से रहते. हमेशा उनकी यही कोशिश होती किसी तरह माँ खुश रहे. इन्ही से तो उनकी दुनिया है. अब माँ ज्यादा बाहर नहीं निकलती. वह काम बच्चे ही किसी तरह कर लिया करते.
एक दिन बगल की पड़ोसन ने बच्चे से पूछ लिया- तेरी माँ आजकल दिखाई नहीं देती.” बच्चे का मासूमियत भरा जवाब, “मेरी नानी गुज़र गयी है. इसीलिए माँ बहुत उदास रहती है और कहीं नहीं निकलती.औरत ने तपाक से कहा- हाय, हाय, तेरी नानी जिन्दा थी. इतने दिनों से तेरी माँ यहाँ है. कभी तो मायके का नाम नहीं लेती थी. कभी तो माँ से मिलने भी जाते नहीं देखा. अब मर ही गयी तो क्या फर्क पड़ेगा. काहे का ग़म!
बच्चे का कलेजा फट पड़ा. यह भी तो उस पार की दुनिया से आई हुई लगती है. वह माँ से यह सब कुछ नहीं कहेगा, कुछ भी नहीं. सचमुच उस पार की दुनिया के लोग अच्छे नहीं होते.

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