जीवन यात्रा



जुलाई महीने का अंतिम सप्ताह रहा होगा. हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी. अपनी दुपहिया वाहन को सर्विसिंग के लिए सेवा केंद्र भेज दिया था. शनिवार को मुझे गाड़ी वापस मिलना तय हुआ था. उस दिन हमलोगों का आधे दिन का ही कार्य दिवस हुआ करता था. अतः मुझे घर आने की चिंता थीं। मैंने अपने भाई से दूरभाष पर संपर्क किया, उन्होंने बताया की मै सेवाकेंद्र पर ही हूं, थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी। इस बाबत मुझे भी प्रतीक्षा करनी पड़ी और फिर मैं भाई के साथ घर के लिए निकल पड़ी।
रस्ते में सब्जी बाज़ार जो की बुध और शनिवार को लगा करता था पूरी बुलंदी पर था। ऐसे तो सब्जी बाजार से मेरा काफी घनिष्ट संबंध रहा करता था। झोले भर -भर कर सब्जी लाना मेरी आदत में शुमार था। लेकिन उस दिन मेरा दुपहिया वाहन मेरे पास नहीं होने की वज़ह से मै बाज़ार करने के मूड में नहीं थी। मेरे भाई ने मछली खरीदने के उद्देश्य से बाइक रोका। मैं सौ प्रतिशत शाकाहारी हूँ और इस वजह से मैंने वहां से हटना उचित समझा और इसी ख्याल से थोडा आगे बढ़ गई। काफी लोगों से जान-पहचान थी नियमित ग्राहक के तौर पर। दीदी, आम ले लो बड़े अच्छे है, सस्ता लगा दे रही हूं। मैं देख रही थी वे आम उतने अच्छे नहीं थे इस कारण वह उसे बेचने को काफी उत्सुक लग रही थी। बहुत मिन्नत कर वह आम तौलने लगी। मैं बरसाती (रेनकोट) पहने हुई थी। कुछ कुछ शोर सुनाई पड़ा और अचानक वह औरत तौलना छोड़ कर पीछे भागने लगी। मुझे कुछ कड़ -कड़ की आवाज़ सुनाई पड़ी जो ऊपर से आ रही थी. जब तक मैंने देखा तब तक तो वह (पेड़ की मोटी शाखा ) टूटकर मेरे ही ऊपर गिरने वाला था। मैं उस ओर देखते -देखते भगवान को याद करते हुए पूरे वेग से लम्बी छलांग लगाई और दुसरे तरफ गिर पड़ी। उसके बाद क्या हुआ ?
मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे शाम हो रही है, दूर -दूर तक कहीं कुछ भी नहीं है। धीरे -धीरे अँधेरा बढ़ता जा रहा है जैसे संध्या और रात के बीच का वक्त हो। अचानक एक विचार चिंगारी की तरह कौंधा --घर में मेरी दो साल की बेटी है, उसे नहीं देख पाऊँगी, अब इस दुनिया से जा रही हूं कहीं अनजाने सफ़र पे। सबकुछ छुटता जा रहा है जैसा ट्रेन के खुलने के बाद लगता है और मेरी चेतना ख़त्म------------
उपरवाला बहुत ही दयालु है। शायद उन्हें उस माँ पर दया आई होगी जो अपनी दो साल की मासूम बेटी जिसके साथ वो जी भर कर खेल भी न पायी है धरती छोड़कर मेरे पास आ रही है, लौटा दो, वापस भेज दो उस धरती पर। अभी उसे वहीं रहने देना ही उचित है। उससे वहां बहुत से कार्य करवाने हैं। और मेरी चेतना वापस आने लगी। धीरे -धीरे मुझे कुछ-कुछ सुनाई देने लगा. चारों तरफ बादल जैसी आकृति दिखाई दे रही थी। एक बूढ़े व्यक्ति की हिम्मत भरी आवाज़ --अरे चलो इनको उठाने में मेरी मदद करो, कैसे हो तुमलोग, थोडा तो सोचो। लगा जैसे उस सर्वशक्तिमान ने किसी फरिश्ते को भेजा है। मेरी आँखे खुलीं तो सबसे पहले मेरी नजर उसी शख्स पर पड़ी, दुबली -पतली काया सफ़ेद दाढ़ी चेहरे पर मुस्कान, बोले-कुछ नहीं हुआ है. आप तो ठीक -ठाक हैं। उन शब्दों में क्या जादू था बयां नहीं कर सकुंगी। वहां मौजूद कुछ लोगों ने मुझे उठने में मेरी मदद की। मैंने खड़ा होने की कोशिश की पर बेकार, मेरा एक पैर नहीं उठ रहा था. अतः वहीँ पेड़ से टिक कर बैठी रही।
मेरे भाई को बहुत लोगों से परिचय था। शायद किसी ने मुझे पहचान लिया था और उसने दौड़कर मेरे भाई को इत्तला दी -एक महिला जिनके ऊपर पेड़ गिर गया था बेहोश हो गयीं थी लेकिन अभी होश में हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह आपकी ही बहन है. मेरे भाई मेरा इंतजार कर रहे थे। उन्हें क्या मालूम मैं अब उनके सहारे के इंतजार में हूं। वे शीघ्र मेरे पास पहुंचे और सहारा देकर खड़ा किया। मेरी हिम्मत बढाई। हमने चाय पी और फिर डॉक्टर के यहाँ पहुंचे। डॉक्टर उम्रदराज और काफी अलग किस्म के इन्सान लग रहे थे। उन्हें मैंने पहली बार देखा था। उन्होंने मेरा चेक अप किया और कहा मेरे ख्याल से कोई मेजर इंजरी नहीं है। शुक्र है उपरवाले का, वरना ऐसे हादसे में कोई बचता है क्या ?मैं मन ही मन उपरवाले का शुक्रिया अदा कर रही थी। घर पहुँची तो सबसे पहले मैंने अपनी बेटी को गोदमें लिया ऐसा प्रतीत हुआ जैसे बरसों बाद मिल रहीं हूं। मेरी स्थिति बहुत कुछ बयां कर रही थी लेकिन उसे क्या मालूम वह तो बस अपनी माँ की गोद पाकर गदगद थी।
हे सर्वशक्तिमान तेरी महिमा अपरंपार है सही कहतें हैं तेरी मर्जी के बिना एक पत्ता तक नहीं हिल सकता। मुझे दूसरी दुनिया से परिचय करवाकर फिर धरती पर भेज दिया शायद बहुत से महत्वपूर्ण कार्य करने बाकि हैं -परिवार, समाज एवं देश के लिए और मैं पुरे मनोयोग से उसे पूरा करुँगी। आपकी कसौटी पर खरा उतरना है मुझे!
हम अपने आपको बडा ही ताकतवर समझने लगते हैं पर हम कितने निरीह हैं! इस जीवन यात्रा में कब किस वक्त सफ़र थम जाए किसी को नहीं मालूम। इसीलिए हमें जो काम आबंटित किया गया है, जो ज़िम्मेदारी देकर उन्होंने हमें भेजा है उसे पूरी ईमानदारी और तन्मयता से निभाएं ताकि उस अनजान सफ़र में जाते वक्त कोई पछतावा या मलाल न रहे। 

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