मेरा माउंट एवरेस्ट
झारखण्ड राज्य के रांची जिले का एक गाँव है पिठोरिया. बहुत बडा दो तरफ पहाड़ों से घिरा हुआ और सब्जी की खेती के लिए विख्यात है. उस समय सुबह टेंडा की आवाज से नींद खुल जाती थी. जाड़ा बीतने को था और मन को भाने वाली गुलाबी सर्दी करीब आ रही थी. मेरे पड़ोस में शादी हुई थी और नई बहु का आगमन हुआ था. हमलोग बड़े उत्साहित थे और किसी बहाने से वहां (पड़ोसी के घर)पहुँच जाते नई बहु के सानिध्य का आनंद लेने. उस परिवार में मेरी हमउम्र लडकियाँ भी थी. अच्छा खासा मनोरंजन होता. एक दिन उन लोगो का पहाड़ पर जाने का कार्यक्रम बना.
मैं बचपन से ही प्रकृति प्रेमी रही हूं. मुझे पेड़-पौधे, नदी-तालाब ,खेत-खलिहान ज्यादा आकर्षित करते हैं बनिस्पत शहरी चकाचौंध के. पहाड़ों से एक खास तरह का लगाव रहा है. अतः उनके पहाड़ पर जाने के नाम से ही मेरे कान खड़े हो गए. मैने भी उन लोगों के साथ जाने की उत्सुकता दिखाई. उस घर की बुजुर्ग महिला ने मुझें आश्वासन दिया की ले जाएगी पर अपनी माँ से अनुमति लेकर आओ. काफी ऊँचा चढ़ना पड़ता है थोडा जोखिम है रास्ता बना हुआ नहीं है किसी तरह पकड़ -पकड़ कर चड़ना पड़ता है. बच्चे लोगों को कुछ ज्यादा ही परेशानी होती है. यह सब सुन कर मेरा उत्साह ठंडा पड़ गया. इसलिए नहीं कि सफ़र मुश्किल है बल्कि माँ की अनुमति मिलने की संभावना कम लग रही थी. वह महिला मुझसे बडा स्नेह रखती थी अतः मैंने उनसे निवेदन किया कि वे मेरी मां को पूरी बात न बता कर सिर्फ इतना कहेंगी कि मै पुरे परिवार के साथ जा रही हूं यह भी मेरे साथ उसी तरह रहेगी आप चिंता न करें .उन्होंने वैसा ही किया और इस तरह मुझे अपनी माताजी की आज्ञा मिल ही गईं. हाँ, पर जातें समय बहुत सारी हिदायतें जरुर दीं.. इस तरह मेरा चिर -प्रतीक्षित स्वप्न पूरा होने वाला था .
वह पहाड़ कोई साधारण पर्वत नहीं था. ऐसी मान्यता है कि ऊपर चोटी पर शिवजी स्थापित थे. वहीँ आसपास में राजा रानी का महल हुआ करता था .वहां नियमित पूजा होती थी. राजा रानी का महल तो नहीं रहा पर उसके भग्नावशेष जरुर दिख रहे थे. किसी समय दंगा-फसाद हुआ था और कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा शिव लिंग को तोड़ दिया गया था. बाद में उस टूटे हुए हिस्से को खोज कर लाया गया और वहां रखा गया, फिर नियमित पूजा होने लगी. जब गाँव में शादी ब्याह होता है तो नव वर -वधु को एक बार वहां दर्शन करना जरुरी होता है. चूकिं शिव लिंग को तोडा गया था अतः उस पहाड़ का नाम मुड़ हर पहाड़ हो गया और अब तक इसी नाम से जाना जाता रहा है. यह कहानी जान कर तो मेरा मन सांतवे आसमान पर पहुँच गया. आह! कल मैं उस जगह को देख पाउंगी, उसी समय मैंने मन ही मन ठान लिया था चाहे कितनी ही उंचाई क्यों न चढ़नी पड़े मैं ज़रूर जाऊँगी. दुसरे दिन सुबह जाना था उस दुर्गम चढ़ाई पर. मन आशंकित भी था और लड्डू भी फुट रहे थे. दोनों बातें साथ -साथ हो रहीं थी खैर किसी तरह रात कटी और वह घडी आ ही गयी
सुबह हुई और सूर्य नमस्कार कर अपने पहाड़ यात्रा की तैयारी शुरू की. माँ की तरफ से पूरी एहतियात बरतने की सीख दी गयी मैंने एकदम आज्ञाकारी बच्चे की उनकी हर बातों को विनम्रता से स्वीकार किया. क्योंकि एक डर सा बना हुआ था कि कहीं कोई विघ्न न आ जाये और मेरी यात्रा रुक जाये. ऊपर वाले की बड़ी कृपा रही और मैं पड़ोसी और उन के बच्चों के साथ निकल पड़ी .
सचमुच रास्ता बहुत ही दुर्गम था. बड़ी मुश्किल से हमलोग आधी दुरी तय कर पाए थे. मैं काफी थक गयी और हिम्मत जवाब देने लगी. इसका कारण था कि मैं यहाँ की आबोहवा से परिचित नहीं थी, मैं मैदानी भाग की रहने वाली थी. मेरी हमउम्र लड़कियों की मदद से मैंने दुर्गम स्थानों को पार किया. कहीं तो देखकर ही डर जाती थी, जिस जगह पर मेरा पैर है उससे बीत भर दूरी पर गहरी खाई दिख रही थी. अगर हाथ की पकड़ ढीली हुई तो हड्डी भी न बचे. थोडा और थोडा और ऐसे करते-करते आखिर पहुँच ही गयी ऊपर उस शीर्ष स्थान पर. अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था, जो कल तक मेरी कल्पना में था वह आज सच है कैसे भरोसा करूँ. तभी नीचे देखा चारों ओर तो पाया कि ये सपना नहीं हकीक़त है. नीचे सभी घर माचिस की डिब्बी की तरह दिख रहे थे, लोगों का तो पता ही नहीं था, हवा बिना रोक-टोक के थपकी देती हुई जा रही थी. इतनी उंचाई पर इतनी बड़ी समतल जगह (आज के बीस-पच्चीस फ्लैट आसानी से समा जाएँ). पास ही आम के पेड़ आँगन सा दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे किसी बड़े से आँगन में बैठी हुई हूँ. ऐसा दृश्य! वहाँ स्थित मुड़ हर बाबा को प्रणाम किया. नहीं भूल सकती उस आनंद के क्षण को. मेरा रोम-रोम आनंदित था, घंटे भर वहाँ रहने के बाद उन नैसर्गिक यादों को समेटते हुए वापस घर लौटी. घर पहुँचते-पहुँचते थक कर चूर हो गयी थी माँ ने मेरा चेहरा देखते ही पढ़ लिया और बोल उठी-मैंने मना किया था न, उतना ऊपर नहीं चढ़ने को. मेरे मूँह से कुछ आवाज़ नहीं निकल रही थी, मौन रहना ही ठीक समझा. दुसरे दिन सुबह उठी तो पाया पूरा बदन दर्द कर रहा है. दोनों कंधे अपने नहीं लग रहे थे लेकिन इस दर्द को सहना ही ज्यादा उपयुक्त लगा क्योंकि यह तो मैंने खुद ही लिया था. करीब एक सप्ताह तक मैं परेशान रही. उसके बाद धीरे-धीरे सामान्य हो पायी. जब तकलीफ बढ़ जाती थी तो उस क्षण को याद करती थी, उस आनंद भरे पल को तो सारी पीड़ा गायब हो जाती थी. काफी दिनों बाद मैंने इस तकलीफ की जानकारी अपनी माँ को दी उन्होंने काफी डांटा-माँ से भी कुछ छुपाते हैं, और प्यार से गले लगाकर कहा, तुम्हारी उत्कट इच्छा देखकर ही मैंने हामी भरी थी. तुम्हारी तकलीफ को मैं अच्छी तरह समझ रही थी और जब रात में तुम नींद में कराहती थी तो मैं उठकर तुम्हारे पाँव दबाती थी, सहलाती थी और तुम फिर शांत हो जाती थी. मैं सब समझ रही थी कि तुम मुझे क्यों नहीं बताना चाहती. सचमुच मुझे अपने ऊपर बहुत ग्लानि हुई. माँ कितनी महान होती है. अपने बच्चे के हर अरमान को पूरा करने में उनका कितना योगदान होता है. उन्होंने मुझे अपने एवरेस्ट पर चढ़ा ही दिया. आज भी जब एकांत में बैठती हूँ और उस क्षण को याद करती हूँ तो अलौकिक आनंद से भर जाती हूँ.
मेरे माउंट एवरेस्ट मैं फिर आउंगी!
वह पहाड़ कोई साधारण पर्वत नहीं था. ऐसी मान्यता है कि ऊपर चोटी पर शिवजी स्थापित थे. वहीँ आसपास में राजा रानी का महल हुआ करता था .वहां नियमित पूजा होती थी. राजा रानी का महल तो नहीं रहा पर उसके भग्नावशेष जरुर दिख रहे थे. किसी समय दंगा-फसाद हुआ था और कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा शिव लिंग को तोड़ दिया गया था. बाद में उस टूटे हुए हिस्से को खोज कर लाया गया और वहां रखा गया, फिर नियमित पूजा होने लगी. जब गाँव में शादी ब्याह होता है तो नव वर -वधु को एक बार वहां दर्शन करना जरुरी होता है. चूकिं शिव लिंग को तोडा गया था अतः उस पहाड़ का नाम मुड़ हर पहाड़ हो गया और अब तक इसी नाम से जाना जाता रहा है. यह कहानी जान कर तो मेरा मन सांतवे आसमान पर पहुँच गया. आह! कल मैं उस जगह को देख पाउंगी, उसी समय मैंने मन ही मन ठान लिया था चाहे कितनी ही उंचाई क्यों न चढ़नी पड़े मैं ज़रूर जाऊँगी. दुसरे दिन सुबह जाना था उस दुर्गम चढ़ाई पर. मन आशंकित भी था और लड्डू भी फुट रहे थे. दोनों बातें साथ -साथ हो रहीं थी खैर किसी तरह रात कटी और वह घडी आ ही गयी
सुबह हुई और सूर्य नमस्कार कर अपने पहाड़ यात्रा की तैयारी शुरू की. माँ की तरफ से पूरी एहतियात बरतने की सीख दी गयी मैंने एकदम आज्ञाकारी बच्चे की उनकी हर बातों को विनम्रता से स्वीकार किया. क्योंकि एक डर सा बना हुआ था कि कहीं कोई विघ्न न आ जाये और मेरी यात्रा रुक जाये. ऊपर वाले की बड़ी कृपा रही और मैं पड़ोसी और उन के बच्चों के साथ निकल पड़ी .
सचमुच रास्ता बहुत ही दुर्गम था. बड़ी मुश्किल से हमलोग आधी दुरी तय कर पाए थे. मैं काफी थक गयी और हिम्मत जवाब देने लगी. इसका कारण था कि मैं यहाँ की आबोहवा से परिचित नहीं थी, मैं मैदानी भाग की रहने वाली थी. मेरी हमउम्र लड़कियों की मदद से मैंने दुर्गम स्थानों को पार किया. कहीं तो देखकर ही डर जाती थी, जिस जगह पर मेरा पैर है उससे बीत भर दूरी पर गहरी खाई दिख रही थी. अगर हाथ की पकड़ ढीली हुई तो हड्डी भी न बचे. थोडा और थोडा और ऐसे करते-करते आखिर पहुँच ही गयी ऊपर उस शीर्ष स्थान पर. अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था, जो कल तक मेरी कल्पना में था वह आज सच है कैसे भरोसा करूँ. तभी नीचे देखा चारों ओर तो पाया कि ये सपना नहीं हकीक़त है. नीचे सभी घर माचिस की डिब्बी की तरह दिख रहे थे, लोगों का तो पता ही नहीं था, हवा बिना रोक-टोक के थपकी देती हुई जा रही थी. इतनी उंचाई पर इतनी बड़ी समतल जगह (आज के बीस-पच्चीस फ्लैट आसानी से समा जाएँ). पास ही आम के पेड़ आँगन सा दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे किसी बड़े से आँगन में बैठी हुई हूँ. ऐसा दृश्य! वहाँ स्थित मुड़ हर बाबा को प्रणाम किया. नहीं भूल सकती उस आनंद के क्षण को. मेरा रोम-रोम आनंदित था, घंटे भर वहाँ रहने के बाद उन नैसर्गिक यादों को समेटते हुए वापस घर लौटी. घर पहुँचते-पहुँचते थक कर चूर हो गयी थी माँ ने मेरा चेहरा देखते ही पढ़ लिया और बोल उठी-मैंने मना किया था न, उतना ऊपर नहीं चढ़ने को. मेरे मूँह से कुछ आवाज़ नहीं निकल रही थी, मौन रहना ही ठीक समझा. दुसरे दिन सुबह उठी तो पाया पूरा बदन दर्द कर रहा है. दोनों कंधे अपने नहीं लग रहे थे लेकिन इस दर्द को सहना ही ज्यादा उपयुक्त लगा क्योंकि यह तो मैंने खुद ही लिया था. करीब एक सप्ताह तक मैं परेशान रही. उसके बाद धीरे-धीरे सामान्य हो पायी. जब तकलीफ बढ़ जाती थी तो उस क्षण को याद करती थी, उस आनंद भरे पल को तो सारी पीड़ा गायब हो जाती थी. काफी दिनों बाद मैंने इस तकलीफ की जानकारी अपनी माँ को दी उन्होंने काफी डांटा-माँ से भी कुछ छुपाते हैं, और प्यार से गले लगाकर कहा, तुम्हारी उत्कट इच्छा देखकर ही मैंने हामी भरी थी. तुम्हारी तकलीफ को मैं अच्छी तरह समझ रही थी और जब रात में तुम नींद में कराहती थी तो मैं उठकर तुम्हारे पाँव दबाती थी, सहलाती थी और तुम फिर शांत हो जाती थी. मैं सब समझ रही थी कि तुम मुझे क्यों नहीं बताना चाहती. सचमुच मुझे अपने ऊपर बहुत ग्लानि हुई. माँ कितनी महान होती है. अपने बच्चे के हर अरमान को पूरा करने में उनका कितना योगदान होता है. उन्होंने मुझे अपने एवरेस्ट पर चढ़ा ही दिया. आज भी जब एकांत में बैठती हूँ और उस क्षण को याद करती हूँ तो अलौकिक आनंद से भर जाती हूँ.
मेरे माउंट एवरेस्ट मैं फिर आउंगी!



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