अपना-अपना हक़
रविवार का दिन छुट्टी का दिन होता है। बच्चों के लिए तो थोड़ी बहुत मस्ती जरुरी है। हमलोग भी छुट्टी के दिनों में खेल -कूद इधर -उधर घूमना -फिरना ,पेड़ पर चढ़ना -----आदि ,आदि बहत सारी मस्तियाँ किया करते थे ।
उस समय दूरदर्शन, वह भी गाँव में नहीं के बराबर था। बाज़ार के दिन लोगों की आवाजाही काफी रहती। हर तरह के लोग गुजरते मसलन -कोई अपने छोटे बच्चे को कंधे पर बिठाये हुए, किसी का लकड़ी का भार (दो लकड़ी का गठ्ठर एक साथ) कंधे पर उठाये हुए दौड़े -दौड़े जाना, युवतियां रंग बिरंगे परिधानों में -यह सब देखकर बडा आनंद आता। फिर सब शाम अँधेरे लौटते। कुछ खाते पीते, कुछ जल्दी में, कुछ अपने घर का सामान लिए हुए बड़े कौतुहल से उन सबको देखते -देखते शाम हो जाती और हम सब पढने बैठते लालटेन की मध्धिम रोशनी में। वो दिन भी क्या दिन थे. ऐसे ही एक दिन हम सब भाई बहन खेल रहे थे। बाज़ार का दिन था। उस गाँव में दो दिन बाज़ार (साप्ताहिक हाट) लगा करता था। एक बुड्ढी औरत बड़े ही तेज क़दमों से आती हुई दिखाई पड़ी। उसकी नजर हम लोगों पर पड़ी तो उसने इधर का ही रुख कर लिया ..उसने अपना लकड़ी का गठ्ठर दीवाल से लगा कर खड़ा किया और कहने लगी बहुत सुखा काठ है ले लो न. अब बाज़ार नहीं जायेंगे. बहुत थक गए हैं. मैंने अपनी माँ को आवाज़ दी जो अपने गृह कार्य में व्यस्त थी. वे तुरंत नहीं आ पाई. उस बुड्ढी औरत की परेशानी देखकर मैंने उसे बैठने को कहा. वह शांत होकर बैठ गयी मानो उसकी लकड़ी बिक चुकी हो. मैंने माँ को बुलाकर कहा -वह औरत बहुत परेशान लग रही है उसकी लकड़ी खरीद लो. माँ को फ़िलहाल लकड़ी की उतनी जरुरत नहीं थी फिर भी उन्होंने खरीद लिया. उतने देर मैंने उससे कुछ पूछताछ की तो पता चला कि वह जंगल में अपने बेटे के साथ रहती है. अlज उसकी तबियत उतनी ठीक न होने की वजह से वह अकेले लकड़ी बेचने आ गई है. जल्दी बिक्री हो जाने पर कुछ खाने-पीने का सामान खरीद कर घर जाएगी ताकि बेटे की तीमारदारी कर सके. इस तरह उस औरत से हमारा परिचय हो गया. उस दिन के बाद वह बराबर आने लगी. कभी हमलोग उसकी लकड़ी खरीदते कभी नहीं भी लेकिन वह आती अपना लकड़ी का गठ्ठर दीवाल से लगाकर खड़ी कर देती थोडा सुस्ता लेती और चली जाती. पानी पीने की इच्छा जाहिर करने पर हम लोग दौड़ कर पानी लाकर दे देते थे. एक आत्मीयता सी हो गई थी. जब तक वो रहती हमलोग उससे जंगल के बारे में कुछ -कुछ पूछा करते.
एक दिन वह बाज़ार से लौटी तो गर्म पानी की इच्छा जाहिर की. मेरी माँ ने उसे गरम पानी दिया तो उसने उस पानी में मडुआ का आटा मिला कर खाया. हमलोग बड़ी उत्सुकता से उसे देख रहे थे. इस तरह बाज़ार के दिन वह एक तरह से हमारे रूटीन में शामिल हो गई थी. जिस दिन वह नहीं आती हमलोग उदास हो जाते, तरह तरह से आशंकित हो जाते -पता नहीं कुछ हो तो नहीं गया, या बीमार ही गई होगी. इस तरह अपनापन और भी बढ़ जाता. काफी दिन बाद वह आई और सीधे जमीं पर बैठ गई और इशारे से पानी माँगा. मैंने माँ से कहा वह औरत बहुत कमजोर लग रही है उसे खाने के लिए कुछ देना चाहिए. माँ ने हामी भरी तो हम लोगों ने उसे खाना खिलाया उसने खाया, पानी पीया और ढेर सारे आशीर्वाद देकर चली गयी अब धीरे -धीरे उसका आना कम हो गया था. वह कभी -कभी ही दिखाई देती थी. एक दिन रात में हमलोग घर में पढ़ रहे थे. यही कोई आठ -नौ बजे का समय रहा होगा अचानक किवाड़ के जोर -जोर से खटखटाने की आवाज़ आई. आवाज़ काफी जोर की थी इसिलए हम सब भाई -बहन काफी डर गए थे. अमूमन इस वक्त कोई नहीं आता था. गाँव के लोग जल्दी सो जाया करते थे और सुबह सूरज उगने के पहले ही उठ जाया करते थे. मेरे पिताजी शिक्षक थे इस वजह से हमारे घर का रूटीन कुछ अलग था. खट खट की आवाज़ और बढ़ गई फिर खोलो -खोलो की आवाज़. हमने इस आवाज़ को पहचान लिया यह उसी औरत की आवाज़ थी और साथ में एक मर्द की भारी आवाज़. हमलोग और भी डर गए. सभी एकदम चुपचाप हो गए. आवाज़ इतनी तेज़ हो गई थी कि लगा जैसे किवाड़ टूट जायगा. फिर गुस्से से भरी आवाज सुनाई पड़ी. मेरे पिताजी ने हमें हिदायत दी --एकदम चुप रहो वे लोग चले जायेंगे. थोड़ी देर बाद आवाज़ बंद हो गई और हमलोगों ने राहत की साँस ली और मन ही मन उस औरत को काफी भला -बुरा कहने लगे. माँ ने समझाया -कुछ मज़बूरी रही होगी, हम भी क्या करें, दो कमरे का घर और ये खाने -पीने वाले लोग ------ज्यादा मत सोचो ,खाकर सो जाओ, कल सबेरे स्कूल जाना है.
सुबह उठी तो मेरा मन किसी काम में नहीं लग रहा था. रात वाली घटना मुझे परेशांन कर रही थी. एक महरी आती थी हमारे घर की साफ सफाई करने, मैंने उससे रात वाली घटना का जिक्र किया. उसने कहा -जरुर आपलोग उसे कुछ खाने -पीने के लिए देतें होंगे नहीं तो वे लोग ऐसा करने की हिम्मत नहीं करते. वे जंगल के लोग हैं जल्दी किसी से घुलते -मिलते नहीं है. मेरे मन में चिंता थी कि वे लोग रात कहाँ बिताएं होंगे. अगल -बगल से जानकारी ली तो पता चला कि उन लोगों ने पी रखी थी इस वजह से सही रास्ता नहीं मिल पा रहा था और वे अपने जंगल वाले घर में नहीं पहुँच सके और वापस लौट गए. उस समय हमलोग उनके दिमाग में होंगे इस वजह से उन्होंने हमारे यहाँ आने की सोच ली होगी. खैर किसी ने उसे रात गुजारने की जगह दे दी थी. मेरे मन को तसल्ली मिली ,भगवान उसका भला करे.
एक दिन रविवार के दिन (बाज़ार का दिन) वह औरत आई और मेरी माँ को बुलाकर हाथ जोड़कर कुछ -कुछ बुद -बुदाने लगी ऐसा लग रहा था मानो उस रात वाली घटना की माफ़ी मांग रही हो. उसकी भाषा हमलोग उतना नहीं समझ पाते थे. उसे अपनी भूल का एहसास हो गया था.
आज सोचती हूं कैसी भूल कैसा पछतावा हमने भी तो उस औरत से अपनापन बढ़ा लिया था. उसे बैठाकर हम अपना स्वार्थ भी तो साधते थे जंगल के बारे में बहुत सारी बातें पूछते रहते थे किस हक़ से -उसने भी तो उसी हक़ से हमसे रात का ठौड़ माँगा था. हम मजबूर थे ,वेसी व्यवस्था करने में असमर्थ थे. उसने तो यही सोचा होगा न कि जब हम उसे खाना दे सकते हैं तो एक रात के लिए आश्रय क्यों नहीं दे सकते. आज सोचती हूं तो लगता है उसने कोई भूल नहीं की, बल्कि अपना हक़ जताने की कोशिश की थी.



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