अधिकार

काफी दिनों पहले की बात है. मैं उस समय बहुत छोटी थी. कभी-कभी पिताजी के साथ जहाँ वे ले जाना चाहते थे जाती थी. छोटा सा कस्बा था. मेरे पिताजी स्कूल में शिक्षक थे, अभी सेवानिवृत हैं. एक बार शाम के समय उन्होंने मुझे साथ लिया और स्कूल की तरफ चल पड़े. शायद उन्हें कुछ अतिरिक्त ज़िम्मेदारी दी गयी थी. स्कूल की दूसरी तरफ एक बड़ा सा आम का बगीचा हुआ करता था, उसके एक कोने को जो रोड के  करीब था तिरपाल और बांस की मदद से एक छोटी सी दूकान की शक्ल दी गयी थी. वह चाय की दूकान, थी दूकान का मालिक पिताजी से परिचित था. संयोग से वह वहीँ रोड पर खड़ा था. पिताजी ने मेरा परिचय उनसे करवाया 'मेरी बेटी है'. मैंने अभिवादन किया जो उस समय शिष्टाचार का प्रतीक था. पिताजी ने मुझसे कहा 'तुम यहीं रुको मैं थोड़ी देर में स्कूल से कुछ ज़रूरी काम निपटा कर आता हूँ'. 

मैं हतप्रभ होकर उनकी तरफ देखने लगी, कुछ बोलती तबतक उस चायवाले ने कहा-'हाँ हाँ आप बेफिक्र जाइए, मेरी बिटिया है आराम से रहेगी. आप कोई चिंता न करें.' मैं कुछ आश्वस्त हुई, और दूकान की तरफ बढ़ी. चाय वाले काका ने मुझे बैठने के लिए कहा. तुरंत ही बिस्कुट और दूध का गिलास मेरे हाथ में पकड़ा दिया और कहा 'जल्दी से खा लो भूख लगी होगी, तेरे पापा  जल्दी ही आ जायेंगे. फिर चाय बनाएंगे और सब मिलकर पिएंगे. वहाँ मुश्किल से दो-तीन ग्राहक होंगे. वे सब मेरी तरफ देख रहे थे. काका उन लोगों से कह रहे थे-'मास्टर साहब बहुत ही अच्छे आदमी हैं, आज पहली बार अपनी बेटी को लेकर आएँ हैं ऐसे कैसे जाने देते.' उनकी बोली में जो अधिकार था वह अपनेपन के एहसास से लबरेज़ था. अबतक मैं सहज हो चुकी थी. फिर वहाँ बैठे लोगों ने मेरा नाम, पढाई (उस वक्त जो बच्चों से पूछा जाता था) पूछना शुरू किया जिसने मेरे अंदर से परायेपन का एहसास गायब कर दिया. पिताजी आ गए और मैं उस एहसास को संजोये हुए घर लौटी.
कुछ सालों बाद वहाँ शिक्षकों को रहने के लिए आवास दिया गया और हम सब लोग माँ पिताजी और हम सब भाई-बहन वहाँ रहने लगे. जब जब घर में दूध घट जाता था मैं उसी दूकान से माँ को दूध लाकर देती थी. चाय वाले काका मुझे चिढ़ाने की कोशिश करते, मैं चिढ़ती भी थी लेकिन फिर भी वहाँ जाने में मुझे कोई परेशानी नहीं होती थी.
गर्मी के दिन आ गए. पेड़ों में आम लद गए थे. एक दिन मैं दूकान पर गयी तो एक हमउम्र लड़की को वहाँ देखा. मैंने उससे नाम पूछा तो थोड़ी शर्मीली सी लगी. बातचीत में पता चला की यह बगीचा उसके पिताजी ने ख़रीदा है. जब तक आम पकेंगे तब तक वह रोज़ यहाँ मिलेगी. मुझे बड़ा अच्छा लगा की चलो एक दोस्त मिल गयी और इसी बहाने बगीचे में भी घुमा करुँगी और एक बालसुलभ स्वार्थ (आम भी खाने को मिलेगा). प्रत्येक दिन तो नहीं मगर मौका मिलते ही मैं वहाँ जाने लगी. चायवाले काका इसी तरह कुछ-कुछ बोलते और मैं पलट कर जवाब देती. एक दिन मैं बगीचे में बैठी हुई थी की जोर की हवा चली और एक पका हुआ आम गिरा. हम दोनों दौड़ पड़ीं. लेकिन आम को मैंने पकड़ा. वह गिर गयी, एक तो उसका वजन ज्यादा था और उसे दौड़ने का अभ्यास नहीं था. मेरे मन में यह बात घर कर गयी की आम को प्राप्त करने में मैंने जीत हासिल की इसीलिए यह आम मेरा होना चाहिए. लेकिन उसने कहा यह मेरा है. दोनों तरफ से वाद-परिवाद हो ही रहा था की एक तगड़ा सा आदमी, शायद वह उस लड़की के पिताजी रहे होंगे (मुझे अच्छी तरह से मालूम नहीं था) नज़दीक आया और कहा-'तुम्हेनही मालूम यह मेरी बेटी है और यह बगीचा मेरा है. यह आम तुम नहीं ले जा सकती इस पर हमारा अधिकार है.' 
ऊपर वाले की कृपा कहें मुझे तुरंत यह बात समझ में आ गयी, और उस फल को मैंने ज़मीन पर रख दिया. एक बार उस लड़की की और देखा- उसका चेहरा भावशून्य था. मैं तेजी से अपने घर की और चल दी. मेरा बालमन कराह रहा था इतने दिन मैंने उस लड़की के साथ हंसी-ख़ुशी बिताये ये उसके पिताजी को नहीं दिखाई दी, लेकिन एक आम का गिरना और मेरा उस पर अधिकार जताना दिखाई दिया. इतने में ही चाय की दूकान आ गयी और मैं ठिठक सी गयी. मुझे लगा मैं रो पडूँगी. पर लम्बे डग भरते हुए उस जगह से, उस बगीचे से अपने को मानो छुड़ाती हुई कहीं दूर, बहुत दूर निकल पड़ी.   

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