अंतर्निहित शक्ति
आज महिलाएँ काफी प्रगतिशील हो गयी हैं, या यूँ कहें कि कहलाती हैं. हमें इस पचड़े में नहीं पड़ना है। आज का अखबार पढ़ा, एक खबर पर मेरी नज़रें टिक गयीं। म्यांमार के राष्ट्रपति थेन सीन ने रविवार को कहा कि आम चुनाव में आंग सान सू की पार्टी को मिली ऐतिहासिक जीत उनके नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार के सुधारों का परिणाम है। मतलब आंग सान सू की राह को सीन ने आसन बना दिया। उन्हें यह कहने में कुछ तकलीफ होती कि आंग सान सू का संगर्ष, उनकी लोकप्रियता ने उनकी जीत को आसान बनाया। ज्यादातर मामलों में हम महिलाओं को यही सब सुनना और सहना पड़ता है।
आज मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जितनी भी महिलाएँ शीर्ष पर आसीन हैं, जिस भी क्षेत्र में हों, उन्होंने कितनी चोटें खाई होंगी, कितनी लहुलुहान हुई होंगी कितने तानों के तीर से हृदय बिंधे होंगे ये और बात है कि कहीं कुछ मरहम और फाहे भी मिले होंगे तब जाकर अपनी मंजिल पा सकी हैं। काफी दिनों पहले मैं रेल यात्रा कर रही थी। वजह थी साक्षात्कार में सम्मिलित होना। लिखित परीक्षा में मेरा चयन हो चूका था। अपने घर में भाई-बहनों में मैं सबसे बड़ी थी। उस समय लड़कियों का अकेले सफ़र करना उसमें भी बिहार में- नामुमकिन था। बड़ी मुश्किल से किसी करीबी रिश्तेदार को साथ जाने के लिए राज़ी किया गया था। खैर हम रेल की बॉगी जो पटना के लिए थी चढ़ चुके थे। अब सीट कौन सा मिला यह देखने की बारी थी। उपरवाली एक बर्थ मेरे हिस्से में आई। बड़ी मुश्किल से ऊपर चढ़ी, चलो अब पटना पहुँच जाउंगी और साक्षात्कार में शामिल होना निश्चित हो गया। ऊपर के बर्थ पर अपनेआपको सामान्य नहीं बना पा रही थी। अचानक बगल के बर्थ पर कोई युवक जो देखने से तृत्य या चतुर्थ वर्ष में पढने वाला छात्र लग रहा था, विराजमान हुआ। दूसरे केबिन में दोनों ऊपरी बर्थ पर भी उसके साथी लोग लग रहे थे। केबिन का ऊपरी हिस्सा तार की जाली से अलग किया हुआ था, या यूँ कहें तीनों मिलकर किसी योजना में शामिल हो सकते थे सिर्फ तार की जाली का अंतर था। मुझे देखते ही सामने वाले युवक के चेहरे पर विद्रुप हसीं आई। दूसरे केबिन वाले दोनों युवकों ने जोर का अट्टहास करते हुए उसका साथ दिया। नीचे बैठे हुए लोग थोड़ा सा हिले पर यथावत हो गए। कुछ देर तो शान्ति रही लेकिन मेरे मन में अशांति थी जो पूरे सफ़र मेरे साथ रही। मैं अपने में खोयी हुई सीधे सामने देख रही थी और पूरी तरह सावधान थी। रात्रि के ग्यारह बज रहे होंगे। सोने का समय हो रहा था। नीचे झांककर देखा लगभग सभी यात्री येनकेन प्रकारेन निन्द्रा देवी की गोद में समा चुके थे, कुछ तैयारी में थे। मेरे साथ जो आये थे वे खर्राटे भर रहे थे। मुझे अतिरिक्त सावधान होना ही था। अब मन में अशांति की जगह चिंता ने ले ली थी क्योंकि बगल के सीटों से खुसर-फुसर की आवाजें आने लगी थी। यूँ कहें, ऊपरी बर्थ पर निंद्रा देवी चढने में असमर्थ थीं। मेरे बगल वाले बर्थ का युवक उठकर बैठ गया और अपने बगल वाले से कुछ बेवजह की बातें करने लगा, कुछ अश्लील फब्तियां भी सुनाई पड़ीं। मैंने गौर किया कि वे लोग मेरी स्थिति (सोना-जागना) जानने की कोशिश कर रहे थे। मेरी बेचैनी बढ़ चली थी। यूँ रोड पर इन मनचलों का खूब सामना कर चुकी थी क्योंकि पैदल चलना मेरी दिनचर्या में शुमार था। वह रोड हुआ करता था और पूरा खुला हुआ यहाँ स्थिति काफी असह्य लग रही थी। रात्रि का दूसरा पहर, ट्रेन के डब्बे का ऊपरी हिस्सा, नीचे सारे यात्री नींद में गोते लगाते हुए। एक बार इच्छा हुई कि नीचे उतर जाउं लेकिन नीचे का नज़ारा देखा तो सिहर सी गयी। सभी पुरुष यात्री थे और नींद से एक दूसरे पर लदे हुए। तिल धरने की भी जगह नहीं थी। आसमान से गिरा खजूर पे अटका वाली कहावत सही लग रही थी। भगवान का ध्यान किया- मुझे शक्ति दो, मुझे रात भर लड़ने के लिए उर्जा चाहिए। क्षण भर में जैसे मुझे अस्त्र मिल गया शक्ति की देवी से। पिछले ही साल मैंने दुर्गा अष्टमी को देवी जागरण के व्रत में हिस्सा लिया था और बिना झपकी लिए रात गुजारी थी। मेरी आत्मा ने मुझसे प्रश्न किया- शक्ति तेरे अन्दर है, पूरी रात बिना पलक झपकाए गुज़ार दे और देख तुझे कौन परेशान करता है?और मैंने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन ली।
कुछ देर तक तीनों युवक कुछ-कुछ उपक्रम करते रहे। कभी मोटी उपन्यास की किताबें जोर से पढने का नाटक करते, कभी कोई फ़िल्मी गाना जो मुझे प्रभावित करने के लायक हो (उनके हिसाब से) गाते, कभी कुछ घटिया स्तर की बातचीत करते। कभी बातचीत अत्यंत धीमी हो जाती। मुझे लगता जैसे वे मुझे अच्छी तरह घूर रहें हो। मैं पूरी तरह से सावधान और अपने अस्त्र से लैस थी। अगर ज़रा सा भी हमला करने की कोशिश हुई तो मैं वार कर दूँगी। मेरी नज़रें घड़ी पर टिक गयीं, रात्रि के २ बज रहे थे। अचानक से ख़ामोशी व्याप्त हो गयी। सिर्फ मैं माँ शक्ति की उपासना में रत व्रती जग रही थी। कहना न होगा मैं अपने व्रत में पिछले साल की तरह ही सफल रही, मैंने अपना साक्षात्कार पूरे आत्मविश्वास से दिया और सफलता मिली। मैंने अपनी नौकरी हासिल की और पूरी ज़िम्मेदारी के साथ अपना उत्तरदायित्व निभाया।
इस घटना ने मुझे ईश्वर का साक्षात्कार करा दिया। ईश्वर हमेशा आपके साथ है, आपके अन्दर है, सारी शक्ति आपमें निहित है। ज़रूरत है पूरी निष्ठा साथ उसे आवाज़ देने की।



Ek hi sadhe sb sadhe.. ..
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