आश्रय
गर्मियों के दिन थे। स्कूलों में गर्मीं की छुट्टियां हो चुकीं थीं। बच्चे बड़े खुश थे। मनमौजी दिनचर्या जो थी. मेरे मन में भी कुछ नया करने का फितूर सवार हुआ. मैंने अच्छे पाट वाले इनार (कुआँ) पर स्नान करने का कार्यक्रम बनाया। इस कुंए की बात थोड़ी अलग थी, बाल्टी बड़ी थी और मैं छोटी। बड़े हिसाब से आधा-आधा बाल्टी पानी भर रही थी, लेकिन अति उत्साह में इस बार पानी पूरा भरा और उस पानी भरे पात्र ने मुझे ही खींच लिया और मैं कुएँ के अंदर। छपाक की आवाज़ हुई। मुझसे पहले वहाँ मेरे एक मुँहबोले मामाजी नहा रहे थे और इस वक्त वे अपने साफ किये हुए कपडे को धूप में सुखाने का यत्न कर रहे थे. वहां आस-पास कोई भी नहीं था. यह छपाक की आवाज़ उन्हें सुनाई दी वरना आज मैं इस धरती पर न होती.
उन्होंने मुझे वहां देखा था और हिलती हुई रस्सी अनुमान को पुख्ता कर रही थी. पूरी शक्ति लगाकर वे चिल्लाये और तभी दूर से कुछ लोग दौड़े और मुझे पानी में डूबने से बचा लिया गया. मुझे जिन्दगी मिल गयी. अब मैं मामाजी का परिचय कराती हूँ, हमारी माँ का घर था. बडा परिवार था. चचेरे भाई बहन भी साथ साथ रहते थे. बच्चों के प्रति नियम कानून थोड़े सख्त थे. हमलोग छुट्टियों में अक्सर वहां जाया करते थे. ये मामा भी एक सदस्य की तरह वहां रहते थे. उनका नाम वासुदेव था. बड़े ही जिन्दादिल इन्सान थे. बड़े लोगों के लिए दातुन की व्यवस्था करना उन्ही के जिम्मे रहती थी. उनकी दिनचर्या भी बड़ी अनोखी थी. जब हमारी नींद खुलती तो उनके भजन हमें सुनाई पड़ते. समय से खाना आरंभ करना और सबकी हाजिरी बनाना. काफी उम्र हो चली (५० के आसपास) और कुंवारे थे, कुछ लोग उन्हें चिढाते भी रहते थे. उन्हें दमा की शिकायत थी, यह भी एक वजह थी उनके शादीशुदा न होने की.
खैर इसी तरह समय बीत रहा था. काफी दिन बाद फिर वहां जाना हुआ. मैं अब बच्ची नहीं थी. हाई स्कूल पास कर चुकी थी, दुनियादारी की समझ आ गयी थी. वासुदेव मामा जी को कहीं नहीं देखा. कोशिश की तो पता चला उन्होंने शादी कर ली और अपने घर चले गए. अब यहाँ यदा-कदा ही आते हैं. बात आई-गयी हो गयी. वर्षों के उपरान्त वहां जाना हुआ. हमारे आँगन में धान कूटा जा रहा था. काफी औरतें ओखल-समाट पर लगी हुई थीं. एक औरत कुछ अलग लग रही थी या यूँ कहें कि किसी भी तरह मजदूर जैसी नहीं लग रही थी. मैं अपनी आदत से मजबूर रहस्योद्घाटन में जूट गयी. कुछ लोगों से पता चला वह सजातीय की विधवा है इसीलिए काम दे दिया गया है. फिर एक और खुलासा एक बच्चा भी है! इसीलिए तरस खाना पड़ा. पर मैं इतने से कहाँ संतुष्ट होने वाली थी. मेरी एक नज़र हमेशा उस ओर रहती.
एक दिन मैंने देखा कि एक पुरुष उनसे डांट कर बात कर रहा है और उसके देखने का ढंग भी मुझे कुछ अजीब लगा. मेरी जिज्ञासा और बढ़ चली. जैसे- वह कहाँ रहा करती थी? किसके साथ रहती है वगैरह-वगैरह. एक दिन मैंने देखा अपने रोते हुए बच्चे के साथ सधिकार वह हमारे कमरे में चली आई और मेरी माँ से कहा- "दीदी, बच्चा बहुत रो रहा है कोई काम नहीं करने दे रहा. किसे कहूँ अपना दुःख एक आप और माँ (मेरी नानी) ही तो मेरा दुःख समझती हैं. कुछ बिस्कुट हो तो दीजिये न बच्चे के लिए." मेरी माँ ने तुरंत कुछ बिस्कुट लाकर बड़े ही प्यार और स्नेह के साथ उस बच्चे को दुलारते हुए दिया. अब मेरी जिज्ञासाओं का बाँध टूट चूका था और मैंने माँ को झंझोड़ते हुए पुछा- "मुझे बताओ ये कौन है? इससे तुम्हारा इतना लगाव, कुछ बात तो है." फिर उन्होंने मुझे बताया- "ये वही वासुदेव मामा की पत्नी है, बुढापे में शादी की और अब देखो इसका क्या हाल है. पेट भरने का तो जुगाड़ इन लोगों ने कर दिया मगर कोई इन्हें आश्रय नहीं देना चाहता. कहाँ और कैसे रह रही है?" अब क्या था मैं उसके आश्रय स्थल की खोज में लग गयी और वहाँ जा पहुँची. वह किसी छोटे विजातीय किसान का घर था. मालकिन मेरी नानी को अच्छी तरह जानती थी. जब उन्हें मालूम हुआ मैं उनकी नातिन हूँ उन्होंने मेरी बड़ी खातिर की. मैंने उनसे पुछा-"मैं एक बात जानना चाहती हूँ. यह औरत जिसे आपने अपने घर में रहने दिया है, उसे आप कब से जानती हैं?" उन्होंने बताया-"वासुदेव जी की पत्नी है बस इतना ही जानती हूँ. तुम लोगों के यहाँ इसीलिए आई थी कि वासुदेव जी वहां रहते थे, तो कोई इन्तजाम हो जायेगा जीने के लिए. उन्होंने काम तो दिया पर रहने का कोई इंतजाम नहीं किया. साफ कह दिया कि ये हमसे नहीं होगा. तेरी नानी चुपचाप मेरे पास आकर बोलीं, अब आपलोग ही कुछ उपाय कर दीजिये. यह कैसे जिएगी? हम तो चाहते थे कि इसके रहने का इंतजाम वहीं कर दें पर मेरी सुनता कौन है. कम उम्र की विधवा है मुझे तो डर भी लगता है."
मेरा नारी मन चित्कार उठा. हाय रे समाज! जिसने आधी जिंदगी तेरे नाम कर दी उसकी पत्नी को तू आश्रय नहीं दे सकता? मजदूर है तो वैसा ही इंतजाम कर देते. आज जब उस घटना को स्मरण करने बैठी हूँ तो लगता है कि अंग्रेजों द्वारा किये गए कुछ काम बुरे नहीं थे. उन्होंने जो सेवा तंत्र बनाया उसमे पति की मृत्यु के बाद पत्नी के भरण पोषण के लिए कुछ तो व्यवस्था दी. उसे आश्रय विहीन तो नहीं किया.



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