उम्रकैद


वह दौर रहा होगा सत्तर और अस्सी (१९७०-१९८०) के बीच का. लोग छुट्टी बिताने के लिए सोचते नहीं थे। दूरदर्शन अभी दूर की चीज़ थी। एन्जॉय (enjoy) शब्द उतना विकसित नहीं हुआ था। जब जी चाहा किसी नाते-रिश्तेदार के यहाँ धमक गए। जिनके यहाँ पहुँचते थे (मेज़बान), वे भी इसे सामान्य प्रक्रिया के तहत लेते थे भले ही आवभगत उतनी न करे, जितना उन्हें अमुक मेहमान से मिला हो। इसी प्रक्रिया के तहत मुझे भी कहीं भ्रमण करने का मौका मिलता था। 

मेरी एक बुआ थी जिनके यहाँ जाने का मुझे ज्यादा अवसर मिला कारण था मेरे पिताजी की पसंद, बड़ी बहन का प्यार भी कह सकते हैं। मुझे भी वे अच्छी लगती थीं। किसी तरह के लाग-लपेट से दूर रहती थीं।  उनके घर के बगल में उनके कोई सगे (ससुराल पक्ष से) रहते थे। बड़ा परिवार था। बहने भी थीं, छोटी बहन हाईस्कूल में पढ़ने वाली थी। आज के हिसाब से कहें तो कॉलेज में पढ़नेवाली जैसी थी। उनका आना-जाना मेरी बुआ के यहाँ था से मेरी कुछ ज्यादा ही जान-पहचान हो गयी थी। मैं बहुत छोटी थी चौथी या पांचवी कक्षा में पढ़ती थी, पर हमारी मानसिक समझ आज के बच्चों के हिसाब से काफी कम थी। वो दीदी कभी मेरी फ्रॉक की तारीफ़ करती तो मैं भी उनकी किसी चीज़ की प्रशंसा कर देती। ऐसे ही चल रहा था। मैं शुरू से ही पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने की शौक़ीन थी। पढ़ती ज़रूर थी भले ही उसका सार मुझे समझ में नहीं आता था। पढ़ने के बाद ऐसा लगता था जैसे कितनी बड़ी बाज़ी मार ली है और अपने दोस्तों पर रौब जमाने में बड़ा मजा आता था। यह धर्मयुग मेरा पढ़ा हुआ है, यह हिन्दुस्तान मैं पूरा पढ़ चुकी हूँ.. . आदि-आदि। उनकी पढाई नंदन और बालक तक ही सीमित थी इसीलिए वो मुझे बड़ी हैरत से देखते थे। एक दिन ऐसे ही बुआ के यहाँ मैं धर्मयुग पलट कर देख रही थी। वह दीदी भी वहीँ थी उन्होंने मुझसे कहा-'उस पन्ने को (फैशन वाला पन्ना) एक बार फिर से पलटो उसमे एक लड़की ने जो शरारा पहना है वो बड़ा ही खुबसूरत है मैं एक बार फिर देखूंगी। मैंने वह पेज पलट दिया। मैंने भी देखा अनायास मेरे मुँह से निकल पड़ा-'दीदी ये आपपर बहुत अच्छा लगेगा आप भी एक सिलवा लो।' उनका जवाब था 'अच्छा लगने से क्या होता है। इसमें काफी पैसे लगेंगे, कौन सिलवा देगा?' उनके चेहरे का रंग एकदम से बदल गया। उनका सोचना लाज़मी था। घर में वे छोटी ज़रूर थीं पिताजी नहीं थे दो भैया-भाभी थे। माँ क्या करे, उन्हें तो अपने बेटे और बहु के हिसाब से ही चलना था। उस समय 'बैंक बैलेंस' का भी उतना चलन नहीं था कि कुछ अपनी पूंजी होती। अपने परिवार में वो ही रूप-रंग, नाक-नक्श से अलग दिखती थी और ढंग से रहने पहनने की उनकी लालसा रहती थी। 
संयोग ही कह लीजिये उसके बाद से मेरा वहां आना-जाना कम हो गया। काफी दिन बाद वहां जाना हुआ और मैंने दीदी के बारे में पूछा मेरी बुआ ने कहा-'नहीं, उधर आना-जाना नहीं है।' मैं मन-मसोस कर रह गयी। मैंने अपनी माँ से इस बाबत जानना चाहा तो उन्होंने बातों में टाल दिया। कुछ आकस्मिक कारणो से  हमें उस रात वहीँ रूकना पड़ा। सुबह जब मैं उठी कल वाली बात फिर मेरे मन को परेशान करने लगी। मैं चुप-चाप एक किवाड़ जो बगल वाले घर में खुलता था खोलने की कोशिश करने लगी। पास ही बैठी एक वृद्ध महिला ने हस्तक्षेप किया-'इसे नहीं खोलना है।' मेरा प्रयास व्यर्थ गया। मैं अपनी उत्सुकता को दबा नहीं पा रही थी। एक खिड़की जो उस घर के आँगन में खुलती थी वहाँ गयी। उस खिड़की में ज़रा सी सुराख़ थी मैंने उसमे आँख सटा कर देखने की कोशिश की। वहां कुछ चहल-पहल दिखी। परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त वहां कुछ अन्य लोग भी नज़र आये। बुआ जी की बहु जो हमारी भाभी थी हमेशा चुप-चुप रहती थीं और किसी के पूछने पर जवाब देती थीं। मैंने उन्ही से पूछना सही समझा और मैंने मौका देखकर पूछ ही लिया-'भाभी क्या बगल वाले घर में कुछ कार्यक्रम है?' लगे हाथों उन्होंने जवाब दिया-'हाँ हाँ पकडुआ ब्याह है न। इसमें न्योता नहीं दिया जाता चुप-चाप शादी कर दी जाती है।' मेरी समझ में आ गया ज़रूर उसी दीदी की शादी है और इसीलिए हमें उधर जाने से मना किया जा रहा है। मेरी उत्सुकता शांत हो गयी। 
मेरे पिताजी का तबादला दुसरे शहर में  गया और फिर वहाँ हमलोगों का आना-जाना बंद हो गया। फ़ोन का चलन नहीं के बराबर था। इधर-उधर से कोई समाचार मिल जाता था। एक बार बुआ जी ही हमारे घर आयीं। उस समय तक मैं मानसिक रूप से परिपक्व हो चुकी थी। मैंने बुआ से उस दीदी के बारे में पूछा। उन्होंने बड़े ही सामान्य ढंग से उत्तर दिया-'अरे, उसने तो परिवार का नाम ख़राब कर दिया था। किसी तरह पकड़ुआ ब्याह करके नईया पार लगा दिया गया।' मैं स्तब्ध रह गयी और फिर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं रही। 
समय का तकाज़ा कह लीजिये उसके बाद मैं अपनी पढ़ाई फिर नौकरी, ज़िम्मेदारी आदि में व्यस्त हो गयी। अनायास एक दिन मुझे उनका सामना एक कपड़ों की दूकान पर हुआ। वह मुझे देख रही थीं, मैं उनकी ओर। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। मैं पहचानकर आश्वस्त नहीं हो पा रही थी। फिर भी मैं उनके करीब पहुंची-'दीदी तुम!' उसने मुझे प्यार से पकड़ कर मेरा नाम लेकर कहा-'तुम यहाँ कहाँ?' थोड़ी देर के लिए मैं उन दिनों में खो गयी, वह प्यार, यह स्नेह और उनके हाथों का स्पर्श, पर यह समय वैसा न था। उनका रूप रंग काफी बदला हुआ था यहाँ तक कि उनका लिबास अत्यंत ही निम्न स्तरीय लगा मैंने सबसे पहले उनके यहाँ होने का कारण पूछा। वह बोलीं-'दशहरा नज़दीक है बच्चों के लिए कपड़े लेने थे।' मैंने प्रश्न किया-'आप अकेली आयीं हैं?' वो फट पड़ीं-'उन्हें कोई मतलब नहीं है परिवार की ज़िम्मेदारी से। मैं पास के ही गाँव में शिक्षिका हूँ और घर का काम इसी तरह बीच-बीच में शहर आकर कर लेती हूँ। तुम कितनी समझदार हो गयी हो?' मैंने बीच में ही टोका-'तुमने अपने ऊपर ध्यान देना बंद कर दिया है। कितने अच्छे ढंग से रहती थी। अब क्यों अपनेआप से बेपरवाह हो गयी हो। तुम नौकरी करती हो तुम्हे लोगों के बीच आना पड़ता है घर की बात और है ऐसा क्यों?' वह मुझे पकड़कर रो पड़ीं-'अरे मेरी चिंता किसे है? तू क्यों चिंतित हो रही है मुझे तो बस कमाकर घर चलाना है। मैं इसीलिए जिन्दा हूँ।' मैंने उनका हाथ पकड़ा और कहा-'अगर मुझसे तुम्हे ज़रा भी स्नेह बाकी है तो तुम मेरा कहा मानोगी। अपने ऊपर भी ध्यान दोगी। मुझे वही पहले वाली सलीके से रहने वाली दीदी चाहिए।' उन्होंने सहमति में सिर हिलाया।आँखों से अश्रुधारा बह चली और भींगे नैनों से हम दोनों विलग हुईं। 
ज़िन्दगी हमें कब किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है। सोचती हूँ कानून की किताब में गलतियों के लिए अलग-अलग सज़ा का प्रावधान है। सज़ा गलतियों को देखकर तय की जाती हैं मसलन एक साल, दो साल, पांच साल और तब उम्रकैद। लेकिन ज़िन्दगी की किताब में ऐसा नहीं है, छोटी सी गलती पर भी सीधे उम्रकैद की सज़ा सुना देती है। यक़ीनन आज स्थिति थोड़ी बदली है लेकिन इसे पूरी तरह बदलना है। यह प्रयास भी हम महिलाओं के खाते में ही आता है।  

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