गंगा की धारा के साथ (संस्मरण)

गंगा की धारा के साथ 
परम सौभाग्य,  गंगा नदी को इतने करीब से देखना सिर्फ देखना ही नहीं उस नदी में नाव में बैठकर किनारे की और जाना, इतना आनंददायक अनुभव समेटने का मौका मिला है- इस ज़िन्दगी में उपरवाले की कृपा असीम है उस समय ऐसा महसूस नहीं कर पायी थी।
लेकिन आज ऐसा लगता है प्रकृति ने मुझे कितनी बड़ी सौगात दी है. सोचती हूँ कभी तो लगता है, चारों ओर पानी ही पानी- जल के सिवा कहीं कुछ नहीं दूर-दूर तक ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे भागीरथी और गगन एकाकार हो रहें हो. बीच में छोटी सी नाव में हम उस विराट मिलन के साक्षी हों. कैसा दृश्य ! कल्पना मात्र से ही रोमांचित हो उठती हूँ. काश, उस नयनाभिराम दृश्य को कैद कर पाती. उस समय मोबाइल का चलन नहीं था. किसी यात्री के पास रेडियो था, अचानक सुमधुर संगीत बज उठा सभी आवाज़ें खामोश हो गयीं। कुछ देर के लिए वहां संगीत और साज (पानी की कलकल ध्वनि) मिलकर हमसे कुछ कहना चाह रहीं थीं- जीवन को इसी तरह बहते रहने दो स्वच्छंद, बेरोकटोक. यह  मल्लाह  तुम्हें जिधर ले जाएँ कोई अड़चन न आने दो---
किनारे पर तो आना ही है, और फिर किनारा आ ही गया. उस नाव में मुश्किल से १५-१६ लोग होंगे जिनमे हम भाई-बहन भी थे, हम सब उतर कर अपने-अपने गंतव्य की और चल दिए.
ज़िन्दगी भी तो उसी अथाह सागर की तरह है, जिसमे अपनी-अपनी नाव से हमें पार होना है. पतवार की भूमिका अति महत्वपूर्ण है वेग के विपरीत जाने के लिए कितनी शक्ति लगानी है, कितना संयम रखना है यह तो हमें ही तय करना होगा.

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