संबंध


हर बागवान अपने नवजात को भी बड़े ही प्यार से सींचता है. हर क्षण उसकी देखभाल कर बड़ा करता है. और फिर एक दिन उसकी छाँव में बैठकर बड़ा ही सुकून महसूस करता है.

एक बगीचा था, बड़ा ही हरा-भरा, सुन्दर और सुरक्षित घेरे में घिरा हुआ. समय की मार कहें, आंधी तूफ़ान का वेग कहें, एक पेड़ चरमरा सा गया. दूसरे पेड़ों ने खुसर-फुसर की, 'हम लोग इसकी मदद कर सकते हैं, मिलकर कुछ सहारा दे सकें तो शायद ये सीधा खड़ा हो पाये.' किसी ने कहा, 'यह तो बागवान का काम है, हम व्यर्थ क्यों परेशान हों'. जिस पेड़ ने चर्चा शुरू करनी चाही थी वह चुप हो गया. बागवान आया उसने उस पेड़ को देखा और चला गया. उसकी स्थिति दिनों-दिन ख़राब होती गयी. अब उस पेड़ से बगीचे की सुंदरता में खलल पड़ने लगा. बागवान रोज़ आता, उस पेड़ को देख भर लेता, उसे उस पेड़ के लिए किसी तरह की चिंता नहीं थी. एक दिन वह भी आया जब उसने निर्णय किया कि इस पेड़ को काट कर फेंक दिया जाए. इसकी वजह से मेरे बगीचे की सुन्दरता में ग्रहण लग गया है और उसने वैसा ही किया. कटे हुए पेड़ को बाहर फ़ेंक दिया गया. 

पेड़ की नन्ही शाखाएं सुन्दर कोपलों के साथ थीं. उन्होंने प्रकृति से गुहार लगायी- हे जीवनदायिनी तुम तो सब कुछ अपने में समा लेती हो. बड़ा-छोटा ऊँचा-नीचे हर जीव-जन्तु का आदि और अंत तुम्ही हो. हमें इस खूबसूरत दुनिया को देखना है, हमारी मदद करो. देखते ही देखते समय की धूल ने उस कटे पेड़ को ज़मीन पर टिकने में मदद की, ओस की बूंदों ने सींचा, हवा ने प्यार की थपकी दी, उसे तो जीवनदान मिलना ही था. छोटी-छोटी जड़ें निकल कर पोषन भी करने लगीं. धीरे-धीरे कोपलें बढ़ चलीं, टहनी और पत्तियां आसमान से बातें करने लगीं. समय आने पर फूल और फल भी लगे. सुगंधें दूर-दूर तक फैलने लगी. वह गंध उस बगीचे (उस नए पेड़ का पुराना निवास) के पेड़ों के पास भी आती. उन पेड़ों ने आपस में बात की 'अरे, ये गंध तो जानी-पहचानी लगती है'. उसने हवा से पुछा,'यह गंध तुम कहाँ से समेट कर लायी हो?' हवा का जवाब था-'मैं कोई भेदभाव नहीं करती, मेरा काम जहाँ भी जो भी मिले उसे दूर-दूर तक फैलाना है. यह तुम खुद ही पता करो'. उन पेड़ों ने उन गगन चुम्बी पत्तियों से खुद बात की.
'अरे- हम लोगों में कुछ तो समानता अवश्य है. हम तुम्हारी ओर खिंचाव महसूस करते हैं.' जवाब मिला-' हमें तो बस इतना पता है कि हमारी जननी को किसी ने दूर कर दिया था, उनसे पूछ कर बताऊंगा.' रात आई, पूरी ख़ामोशी थी. पत्ती ने शाखा से सवाल किया, शाखा ने तने से पूछा--'क्या हम उस बगीचे से कोई संबंध रखते हैं?' तने का जवाब था--'बेटे तुम इन सब बातों पर ध्यान मत दो, अपनी ऊर्जा का क्षय मत होने दो. क्या हुआ हमारी जड़ें उतनी मजबूत नहीं हैं, मैं तो हूँ तुम सब का भार लिए हुए, और आखिर तक संभाले रहूंगी. तुम बेफिक्र ऊंचाइयों को छुओ और अपनी दुनिया में मस्त रहो. और वह सब कुछ प्राप्त करो जो कर सकते हो. धीरे-धीरे जड़ें भी मजबूत हो रहीं हैं. और सुनो--'एक पते की बात, तुमने संबंध का ज़िक्र किया है न, तुम्हारा संबंध उस तुच्छ बगीचे से नहीं इस विराट प्रकृति से है. हमेशा इसकी सेवा करना. यही मेरी इच्छा है.'

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